मंगलवार, 24 जून 2025

दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

 


    
                                                        (फोटो गूगल से साभार)



बादलों का गर्जन, नभ विशाल गूँजा है
दिन ने ओढ़ा तमस, मन जा कहीं उलझा है  
खुल रही गांठें अंतस की, एक पूरी एक आधी है  
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

तेज बहती हवाएँ, दिल का इम्तिहान लेती हैं
जड़ बने पत्थर, भीगते हुए कुछ कहती हैं  
सिसकियाँ बह गयी पानी संग, दर्द जो काफी है  
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

रिस रिस कर बूंदे, अभी पत्तों से गिर रहीं हैं
धीमी धीमी सी आवाज, कानों में घुल रहीं हैं
तुम मिलो तो शांत हो, अंदर बेचैनी की आँधी है
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

शाम का श्याम भीगता, कहीं बांसुरी बजा रहा है
भटका राही कहीं कोई, एक राह दिखा रहा है  
लौकिक-अलौकिक सब भीगे, नदी किनारे माझी है
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है 

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

नारी, तुमसे होता जग यह पूरा

(फोटो गूगल से साभार)



मंद समीर सी चलने वाली 
नदी सी कल कल बहने वाली 
जहाँ दिल दरिया और मन समंदर
करुणा और ममता का सागर 
तुम ना हो तो जग अधूरा
नारी, तुमसे होता जग यह पूरा

तुम माँ, तुम भगिनी
तुम बेटी, तुम अर्द्धांगिनी 
हर रूप तुम्हारा अद्भुत है
प्रेम, वात्सल्य, दया, त्याग
सब तुम्हारे पर्यायवाची
सब तुम्हारे ही रूप हैं 

तुम रानी लक्ष्मीबाई 
तुम राणा की पन्ना धाय
तुम चितौड़ की पदमिनी 
तुम वीरांगनी, तुम ओजस्विनी 

तुम इंदिरा सी नेतृत्व हो 
तुम कल्पना की उड़ान
तुम राष्ट्र शक्ति हो 
तुम देश का स्वाभिमान 

धरा से गगन तक
बस तुम्हारा विस्तार है 
नारी शक्ति, नारी संबल 
तुमको शत शत नमस्कार है !!


मंगलवार, 15 जनवरी 2019

जिंदगी तेरा मेरा रिश्ता बड़ा अजीब है

(फोटो गूगल से साभार)


जिंदगी तेरा मेरा रिश्ता बड़ा अजीब है
कभी तुम मुझे देख कर हँसती  हो 
तो कभी मैं तुम्हें देख कर हँसता हूँ 

संग संग तुम्हारे चलना बड़ा अनोखा है
कभी तुम मेरे पीछे होती हो 
कभी मैं तुम्हारे पीछे होता हूँ 

तुम हो क्या, समझना मुश्किल है जरा 
हर रूप अलग सा है तुम्हारा 
हर पल तुम संग विचित्रताओं से भरा  

तुम अहसास हो कभी, तो कभी आभास हो
तुम नीम हो कभी , तो कभी मिठास हो
बेशक एक पहेली हो, पर मेरे लिए ख़ास हो 

जिंदगी, हम तुम सदा ऐसे ही लड़े झगडे
हँसे हँसाएँ आपस में और कभी रूठे मनाएँ
पर साथ अनूठा बना रहे, ऐसे ही बस चलते जाएँ



शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

निमिया के डाढ़ी मैया

(फोटो गूगल से साभार)


निमिया के डाढ़ी मैया एक प्रचलित माता गीत है बिहार, उत्तरप्रदेश आदि क्षेत्रों में।  इस गीत का लिरिक्स (बोल)  ढूंढ रहा था इंटरनेट पे हिंदी में, मुझे नहीं मिला।  फिर मैंने गाना सुनकर उसका लिरिक्स खुद से लिखा है।  मुझे यह गीत बहुत ही पसंद है। यहाँ साझा कर रहा हूँ शायद कोई सज्जन लिरिक्स (बोल) ढूंढे तो उसे यह मिल जाए। अगर कुछ त्रुटि हो तो कृपया टिपण्णी (कमेंट) करके मुझे जरूर बताएँ मैं उसमें सुधार करूँगा। 

|| जय माता दी ||  

निमिया के डाढ़ी मैया - २ 
डाले ली असनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 

सातो रे बहिनिया के भैरों हवें भैया 
आदि शक्ति देवी के अनेक बाटे नैया - २ 
जेकरा सहारा नईखे - २ 
राखे लीं शरणवा
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं वरदनवा 
कि झूमी झूमी ना  
मैया दे लीं वरदनवा 
कि झूमी झूमी ना  

कामरुख कमख्या कलकत्ता वाली काली 
मैहर में शारदा विंधाचल विंध वाली - २ 
काश्मीर में वैष्णो देवी - २ 
जाने ला जहनवा 
कि झूमी झूमी ना   
भक्त करे दर्शनवा 
कि झूमी झूमी ना 
भक्त करे दर्शनवा 
कि झूमी झूमी ना 

आरा ऐरन देवी विन्धा में महथिन दाई 
शीतला बनारस बाड़ी अन्नपूर्णा माई - २ 
बाड़ा भीड़ होला ओहि जा 
बाड़ा भीड़ होला धनतेरस के बिहनवा  
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं अन्न धनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं अन्न धनवा 
कि झूमी झूमी ना 

राजरप्पा छिन्नमस्तिका कैमूर में तारा रानी
बाड़ी उजियार घाट मंगला भवानी - २
गहमर सकरा गढ़ में - २  
कमख्या   स्थनवा  
कि झूमी झूमी ना 
करे ला छाऊ बाबा पूजनवा 
कि झूमी झूमी ना 

भलनि भवानी पटन देवी थावे वाली 
बाड़ी डुमराव  डुमरेदिनी अउरी काली  - २ 
सावन सप्तमी के चढ़े - २ 
पुआ पकवनवा 
कि झूमी झूमी ना 
भरत गावे ले भजनवा 
कि झूमी झूमी ना 


निमिया के डाढ़ी मैया - २ 
डाली ली असनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 



इस गीत का वीडियो लिंक : https://www.youtube.com/watch?time_continue=435&v=pqDJcIw3Qlw
(आप भी सुनेें, बहुत ही सुंदर गीत है। )




बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

खुली किताब



(फोटो गूगल से साभार)


मैं एक खुली किताब
जिसने भी मुझे पढ़ा
मुझे भिगोता गया 
अपने आँसूओं से 

जिस वजह से 
मेरे शब्द 
धुंधले हो गए हैं 
मुझे पढ़ने में अब
लोगों को बड़ी मुश्किलें होती है 
शब्द , स्पष्ट नहीं दिखते
और कहीं कहीं तो 
पूरा का पूरा 
पृष्ठ ही धुंधला है

मुझे  पढ़ने वाले
अब समझ नहीं पाते मुझे
अनुमान से शब्द अधूरे, पूरे करते हैं 
पर वो शब्द 'अधूरा' ही रह जाता है
और शायद 'सत्य' भी 

कभी कभी 
खुली किताब होना भी
अस्तित्व के लिए 
खतरा बन जाता है
जाने अनजाने में ही
बहुत कुछ मिट जाता है 
बड़ा ही पीड़ादायक होता है फिर
खुद को संभालना 
मैं और क्या कहूँ तुमसे
तुम मुझे ही देख लो !




मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ

(फोटो गूगल से साभार)

चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
तबियत में उतार चढ़ाव लाजिमी है 
जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ 

हसरतें कई बह जाती हैं
रेतीली लहरों के साथ साथ 
उम्मीदें कई उड़ जाती हैं
बहती हवाओं के साथ 
पर मजबूर हूँ दिल से ए जिंदगी
मुस्कुराने की आदत है, मुस्कुराता चलूँ
हसरतों का कारवां फिर बनाता चलूँ 

कोरे कागज़ पर लिख कर 
क्यूँ फेंक दे फिर उसे मोड़ माड़ कर 
तल्खियां रिश्तों में आम है
क्या मिला है बगिया उजाड़ कर  
उड़ाने और लपेटने का पतंग
सिलसिला ये लाजवाब है
रिश्तों को संभालना जो सीख ले
वो दुनिया में बेमिसाल है
अपनापन सा कुछ मिठास मिलाता चलूँ
रिश्ता इंसानियत का और बनाता चलूँ 

बिखरना और टूटना मानता हूँ
पर टूट कर जुड़ना भी जानता हूँ
अमावस का आना तय है हर महीने
ख्याल में पूणर्मासी के रातें गुजारता हूँ 
सीखने को बहुत कुछ है जिंदगी में
पर ढाई आखर की महता पहचानता हूँ 
हैं अंधेरों से बातें करती कई राहें
उन राहों पर दीप जलाता चलूँ 
जिंदगी तुम बहुत खूबसूरत हो
चलो तुम्हें तुम्हारा दीदार कराता चलूँ 



सोमवार, 28 अगस्त 2017

जमाना जिसके लिए आज मूक बधिर है

(फोटो गूगल से साभार)

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है 

गड्ढे हैं आँखों के नीचे
उन गड्ढों में तैरता 
कोई छंद है 
आँखों से निकल कर 
एक कविता बह रही है 
फटे चीटे कपड़े बदन पर
दिल में कोई जख्म है, पीर है
शाम की विश्राम करती राहों पर
चल रहा कोई फ़कीर है

अँधेरा होने को है 
चाँद निकाला है उसने
अपने बाईं तरफ वाली 
ऊपरी जेब से
रख लिया है हाथों में
दर्द की तनहा रातों में 
गीत गाता हुआ
तोड़ रहा  
ख़ामोशी की जंजीर है 
पर ना जाने क्यूँ  
जमाना जिसके लिए 
आज मूक बधिर है 

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है !

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे

(फोटो गूगल से साभार) 


लगा सुनाने बारिश का पानी
भीत छुपी थी कोई कहानी
बहने लगा है संग संग जिसके
यादें जो हो चुकी पुरानी
छप्पक छईं पानी में उतरा कोई  
लौट आई फिर अल्हड़ जवानी 
रूठे पिया को चला मनाने, भीग रहा मन मीत वही ढूंढें 
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 

धमक धमक बादल हैं गरजे
चमक चमक बिजली है चमके
काली चादर ओढ़े अम्बर
खोल रहीं हैं मन की परतें 
सिली सिली सी दिल की अंगराई
चेहरे पर इक मुस्कान है लाई
पिया के होने का अहसास, धरती अम्बर इक डोर में गूंदे   
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 


डाली डाली, पत्ता पत्ता 
वसुधा का अंग अंग है भीगा
काली कजरारी आँखों में
प्रेम का सुन्दर रंग है दिखा
सुर्ख भीगे अधरों पर 
नाम प्रीत का आकर टिका
अम्बर सा विस्तार पिया, साकार होती दिल की उम्मीदें  
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 


गुरुवार, 29 सितंबर 2016

टूट कर गिर जाएगा आसमां यह किसने कह दिया

(फोटो गूगल से साभार)


कुछ लोग बिहार को बहुत ही निम्न दृष्टि से देखते हैं और गाहे बगाहे कुछ ऐसे बयान दे जाते हैं जो काफी दुखदायी होता है।  आज बिहार की वर्तमान स्थिति भले उतनी अच्छी नहीं हो लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हमेशा ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी।  समय के साथ सब बदलता है  और बिहार में भी सकारात्मक बदलाव आएँगे ऐसी मेरी आशा है।  दोस्तों मेरा पूर्ण विश्वास है कि एक समय आएगा जब लोग दिल से बोलेंगे कि 'बिहार है तो बहार है' :-)


अस्त हुआ सूरज कभी उगता नहीं 
यह किसने कह दिया 
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया 

बुद्ध महावीर की धरा 
ज्ञान की मशाल जला 
जिसने विश्व को शून्य दिया
जिसके ऊपर विज्ञान चला 
विश्व कटोरे में जिसने 
ज्ञान अमृत भर दिया  
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया 

विश्व विजेता सिकंदर की 
जहाँ रूहें काँप उठी
बिन लड़े ही जहाँ हारा वो 
चंद्रगुप्त की यह वीर भूमि 
वीर कुंवर सिंह जैसे अदम्य वीर ने  
जहाँ अंग्रेजों को धूल चटाया 
आजादी के शंखनाद को 
गांधी ने जहाँ आवाज उठाया  
यह अपराजित धरा 
अपराजेय ही रह गया  
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया 

जिसने राष्ट्र को अपना 
पहला राष्ट्रपति दिया 
पहली लोकतंत्र की नींव  
जिस धरा पर रखा गया  
लोकनायक जयप्रकाश 
कर्पूरी की जन्मभूमि को
हर कोई नमन कर गया 
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया

ऐसे अनगिन गाथाएं 
क्या क्या अब हम गिनाएँ 
जिसने देश के गौरव में 
जाने कितने चाँद लगाए
उस गौरवशाली धरा पे 
हम गौरवान्वित हुए जाएं
दिल से हर कोई जिसको 
कई सलामी दे गया 
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया

अस्त हुआ सूरज कभी उगता नहीं 
यह किसने कह दिया 
टूट कर गिर जाएगा आसमां 
यह किसने कह दिया 




मंगलवार, 19 जुलाई 2016

मन श्रावणी हो उठा है जाग उठा फिर वृंदावन

(फोटो गूगल से साभार)


आँख मिचौली करता बादल
प्रिये, खेल रहा तेरी आँखों में 
अभी अभी बरसा है सावन 
लिपट सिमट तेरी बाहों में
दिन रात किनारे बैठे दोनों, देख रहे यह दृश्य मनभावन
मन श्रावणी हो उठा है, जाग उठा फिर वृंदावन 

बूँद बूँद प्रिये सजा रहा 
चूड़ी कंगन बिंदिया टिकुली 
मेघ घना बालों में उमड़ा
मेह सजी नथनी और बाली
श्रृंगार अनूठा शोभित मुखमण्डल, प्रीत भरे ये रीत नयन 
मन श्रावणी हो उठा है,जाग उठा फिर वृंदावन

मयूर पंख सा विस्तार लिए 
मन मगन आह्लादित है 
चंचला चपला कामिनी रमणी 
दिल देख प्रिये आनन्दित है 
टूट रहा अब हर बंधन जैसे, बँध रहे दो अंतर्मन 
मन श्रावणी हो उठा है,जाग उठा फिर वृंदावन



शुक्रवार, 20 मई 2016

पहला और दूसरा






पहला शांत है 
पर चेतन, जागृत
दूसरा अशांत है
उद्वेलित 

कोशिश कर रहा  
दूसरा  
पहले को परेशान 
करने की 

पर पहले को 
गुस्सा नहीं 
प्यार आ रहा  
दूसरे पर 

पता है पहले को  
कि दूसरा नादान है 
चंचल है 
यही सोच 
कोई प्रतिक्रिया नहीं 
बस शांत बैठा है पहला 

कुछ देर बाद 
दूसरा खुद शांत हो जाता है 
और पहला 
मुस्कुरा रहा होता है 
चुपचाप 

जो किसी ने पूछा
दोनों से 
परिचय उनका 
पहले ने बताया 'दिल'
दूसरे ने 'मन'





शनिवार, 26 दिसंबर 2015

राह दिखाएँ खुद को

(फोटो गूगल से साभार)



तमस में घिरते 
व्याकुल मन को 
देख रहीं 
अदृश्य निगाहें (मन की)
दीपक लेकर चलता कोई 
पर नहीं खुलती हैं 
बंद निगाहें 

सृजन और विध्वंस 
के मध्य 
दो पाटी में पीसता मन 
मन की व्याकुलता
बाँध ना पाया 
धरा की अपनी सीमाएँ 

निज मन में ही 
शक्ति अकूत 
बाँध सके जो खुद को 
घोर  तमस में दीप जलाए 
राह दिखाएँ खुद को 


गुरुवार, 19 नवंबर 2015

राधे तेरे इंतजार में श्याम अकेला बैठा है

(फोटो गूगल से साभार)


हर्फ़ हर्फ़ गुजरो मेरी कविता से  
और हर शब्द सोना हो जाए
बस लिख दूँ रौशनी 
और रौशन हर इक कोना हो जाए 

फड़फड़ाते पन्नों को 
ना जाने कौन सी हवा लगी है 
तेरी आरजू बन मेरी कविता 
अरमां लिए बस उड़ने लगी है

नीला हुआ करता था कभी 
जो दावत, आज गुलाबी है 
बहके हुए से हैं हर शब्द 
शब्द शब्द शराबी है

भीग रहा मेरी कविता का आँगन 
मन वृंदावन हो बैठा है
युग बदला है देखो कैसा 
राधे तेरे  इंतजार में 
श्याम अकेला बैठा है 


गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

अनमोल उपहार

रात के ११.४५ बजे हैं और मोबाईल पर एक नाम फ़्लैश हो रहा है - रोहित ... कॉलिंग ।  संध्या अभी तक जाग रही है । भला मेट्रो सिटीज में रात को इतनी जल्दी कौन सोता है । कुछ सोच रही थी संध्या और और कुछ देर पहले व्हाट्स एप पे उंगलियाँ टाइम पास कर रही थी । फेसबुक पर अभी अभी एक स्टेटस डाला था और १० मिनट के अंदर १३ कमेंट्स ४७ लाइक्स आ चुके हैं । मोबाईल साइलेंट मोड में रख थोड़ा बालकनी में मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए सिगरेट के धुएँ उड़ाए जा रही थी । या यूँ कहे की अब यह उसकी रोज की आदत बन चुकी है । बिना सिगरेट के नींद कहाँ आती है । आदत से लग गयी है उसको । रोहित .... कॉलिंग अभी तक स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा है । ३ मिस्ड कॉल और उसके बाद मोबाइल भी चुप हो गयी । सिगरेट के कश लेने के बाद संध्या ने मोबाइल की चुप्पी तोड़ी । ' ३ मिस्ड कॉल्स .... रोहित '  देख संध्या ने मोबाइल के बटन दबाए ।  थोड़ी ही देर में रोहित की मोबाइल की घंटियाँ बजने लगी । रात के लगभग १२.३० बज चुके हैं । ' क्या हुआ रोहित, क्यों कॉल किया अभी …… मैंने तुम्हें मना किया था ना, कॉल नहीं करने को, फिर क्यूँ  किया कॉल ' - संध्या कुछ ज्यादा ही सख्त लहजे से बोली । ' अरे संध्या मेरी बात तो सुनो, तुम ऐसा कैसे कर सकती हो …… तुम समझने की कोशिश क्यूँ नहीं करती .... संध्या आई रियली लव यू ' - और ये बोलते बोलते रोहित की आवाज बैठ सी जाती है । 'बट .... आई डोन्ट लव यू  एंड आई नेवर लव्ड यू , ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है रोहित  ....  ' । 'तुम्हे मेरी बात बुरी लग रही होगी  पर सच्चाई यही है कि हमलोग एक अच्छे दोस्त हो सकते हैं पर एक अच्छे लाइफ पार्टनर नहीं ', संध्या यह कहते हुए चुप हो जाती है। 'क्यूँ  नहीं हो सकते एक अच्छे लाइफ पार्टनर , आखिर क्या कमी है मुझमें, पढ़ा लिखा हूँ और एक अच्छी जॉब है मेरे पास और दिखने में भी उतना बुरा नहीं हूँ  और मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें बहुत खुश  रखूँगा ' , रोहित पूरी तरह से आवेग में बहा जा रहा था । संध्या बीच में ही टोकती हुई  .... 'रोहित ऐसी बात नहीं है, मुझे पता है कि तुम एक अच्छे दोस्त ही नहीं एक अच्छे इंसान भी हो , लेकिन सच बोलूँ रोहित तो मैं तुम्हारे काबिल नहीं , आखिर तुम्हें मेरी बुराईयाँ क्यूँ नहीं दिखती  … तुम  .... तुम एक सीधे सादे इंसान हो जिसे किसी चीज की बुरी लत नहीं है और मैं एक ऐसी लड़की हूँ जो दिन रात शराब और नशे में धुत रहती है …… तुम और मुझमे ऐसा क्या है जो हमें एक कर सके ' , और यह बोलते हुए एक खामोशी कुछ सेकंड्स के लिए खींच जाती है दोनों के बीच । रोहित ने चुप्पी तोड़ते हुए बोला ' प्यार … 'प्यार' है हम दोनों के बीच जो हमदोनों को एक कर बांधे रखेगी  .... और तुम संध्या , तुम्हें अपनी अच्छाई क्यों नहीं दिखाई देती  …… माना कि तुम्हें नशे की आदत है और इसकी वजह से यदि तुम मुझसे दूर रहना चाहती हो तो यह गलत है  … विश्वास मानो संध्या मैं जहाँ तक तुम्हें जानता हूँ तुम मेरे लिए सबसे बेस्ट हो '। ' याद है मैं एक बार तुम्हारे साथ पार्क गया था और तुमने वहां एक गरीब बच्चे को अपनी गोद में ले उसका माथा सहलाया था और फिर उसे एक आइसक्रीम खरीद कर दी थी और वो बस तुम्हे स्नेह भाव से देखता रहा था ,,,, मैं उस संध्या को पाना चाहता हूँ ' । ' और तो और उस दिन अस्पताल में तुमने उस गरीब को अपने पर्स के सारे पैसे निकाल कर दे दिए थे जो अपनी बेटी के इलाज के लिए वहां आया था पर उसके पास पैसे की कमी हो चली थी ' । ' संध्या मैंने तुममें ऐसी कितनी ही अच्छाईयां देखी है और सबसे बड़ी अच्छाई कि आज भी तुम मेरे भले के लिए मुझे ठुकरा रही हो ' । ' संध्या नशे की आदत आज ना कल छूट जाएगी पर अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो फिर ऐसा होगा जैसे मैंने ऊपर वाले से मिले एक अनमोल उपहार को छोड़ दिया है ' । ' संध्या तुम मेरे लिए एक अनमोल उपहार हो  .... प्लीज तुम ऐसा मत सोचना कि बस मैं तुम्हें पाने के लिए कुछ भी बोले जा रहा हूँ ,,, ये मेरे अंदर की सच्चाई हैं संध्या ,,,, प्लीज तुम ना मत बोलो ' । संध्या यह सब खामोश सुने जा रही थी ,,, बिलकुल खामोश और फिर उसने कहा - 'चलो रोहित बहुत बोला,, जा कर सो जाओ और मुझे भी नींद आ रही है ' ।  फिर रोहित ने टोकते हुआ कहा , 'पर  .... कुछ तो बोलो  … ' ।  रोहित के कुछ बोलने से पहले संध्या ने कॉल कट किया और बिछावन पर लेट कुछ सोचने लगी ।  ' रोहित … कालिंग ' स्क्रीन पर फिर से फ़्लैश हो रहा है ।  थोड़ा मुस्कुरात हुए संध्या ने कॉल कट किया और आँखें बंद कर कुछ सोचते हुए अपनी पलकें बंद कर नींद का इंतजार करने लगी  … । 

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मुस्कुराएगा जो सदा


(फोटो गूगल से साभार)


वह तमाशबीन नहीं बना रहा 
औरों की तरह 
उठा और चढ़ गया आसमां पर 
बन कर सूरज चमकने लगा 

रात भर जहाँ नाउम्मीदी पसरी थी  
वहाँ नव ऊर्जा बन बहने लगा 
नव उत्साह लिए साँसों में 
बागों में महकने लगा 

बिना मुश्किलों से डरे 
चुनौतियों को हुंकार भरता  
हर कदम  हर सफर 
हर साँस हर डगर 
हर प्राण ओज भरता 

हर भेदभाव से परे 
सहृदय हर किसी से
मानवता का अर्थ गढ़ता 
एक पथ प्रदर्शक, मार्गदर्शक  
आदर्श की नव नींव रखता 
वो चलता रहा, बस चलता रहा 

वो कभी थका नहीं 
वो कभी झुका नहीं 
क्या कुछ वो गढ़ गया 
पर कभी रुका नहीं 

यह सूरज वह सूरज नहीं 
है अस्त जो हो जाता  
यह, वह सूरज है 
जो हर दिल में
है सदा उदित रहता
मुस्कुराता है सदा 
मुस्कुराएगा जो सदा  


शत शत नमन !!

शनिवार, 13 जून 2015

आधा मन

( फोटो गूगल से साभार )  


कदम दर कदम 
संग चलता है मेरे 
तुम्हारा  'आधा मन'

अक्सर हाथ की 
आड़ी तिरछी रेखाओं में 
ढूंढता हूँ तुम्हारा  
बाकी बचा 'आधा मन'

पर हर बार पाता हूँ 
कुछ अलग सा 
हाँ, बिलकुल अलग  … 
जैसे कुछ कपोल अरमां
और तल्ख़  धूप  में 
लिपटा एक टुकड़ा
बारिश का

मेरे माथे की तीन रेखाएँ 
आज भी जिक्र छेड़ती हैं तुम्हारा
अक्सर आधी रात को 
और आज भी बेवजह 
मुस्कुरा देती हैं 
तुम्हारे 'आधे मन' की 
उस मुस्कुराहट  से 

तुम्हारा भी 'आधा मन' 
कभी पूरा ना हो पाया 
हो सके तो ले जाओ 
अपना 'आधा मन'
ताकि तुम पूर्ण हो जाओ
या फिर दे जाओ 
बाकी बचा 'आधा मन '
ताकि 'हम' पूर्ण हो जाएँ

इसी इंतजार में 
प्रतीक्षारत 
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा  
वही .... 'आधा मन' !




शुक्रवार, 15 मई 2015

झुकी पलकें


(फोटो गूगल से साभार)


झुकी पलकें 
बड़ी ख़ामोशी से 
लम्हा लम्हा 
सहेज रही है 

ओस की एक बूंद 
आ टिकी है पलकों के कोर पर 
और शबनमी हो गयी आँखे 
बस बंद ही रहना चाहती हैं 

रात शतरंज की बिसात बिछाए 
बैठा है 
शह और मात के बीच 

अभी अभी खामोशी टूटी है 
कुछ गिरा है 
जमीं पर आकर 

जो देखा तो 
चाँद बिखरा पड़ा है 
टुकड़ों में 
और पलकें 
अभी भी 
झुकी हैं 
समेटे कुछ ख्वाब 
अपनी परछाईयों में 




बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ये बिंदिया



(फोटो गूगल से साभार) 




तुम्हारी आँखों में 
सवाल हजार हैं
तुम्हारे माथे की बिंदिया 
उनके जवाब हैं 

तुम बोलो ना बोलो 
ये बिंदिया बोल देती है 
तुम्हारे सारे जज्बात 
यूँ ही खोल देती है 

तुम्हारे रंज 
गिले शिकवे 
सब चुपचाप सुनती है 
तुम्हारी बिंदिया ही तो है 
जो माथे की गहन
रेखाओं के बीच 
खुशियाँ ढूँढ लेती है 

यही बिंदिया है 
जो कर जाती है
हर शाम पूनम 
भर रही होती जो उजाला 
मन में, जिंदगी में 
धीरे धीरे 
मद्धम मद्धम 





शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

भीगी पलकें


भीगी पलकों से 
उनकी मुस्कुराहटें 
गीली हो चली 

खामोशी और मौन में 
भीगता रहा दो मन
बड़ी देर तलक 

दिल की सारी शिकायतें 
सारे गिले शिकवे  
बह गए कहीं 

रात के 
आसमां पर 
काले बादल थे 
बस थोड़ी देर पहले 

अभी चाँद 
उफ़क़ कर 
आ गया है वहाँ 
मुस्कुराते हुए  


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