सोमवार, 17 अगस्त 2026

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते

चित्र - ए आई निर्मित

                                                                     (चित्र - ए आई निर्मित)


उमड़ रहें हैं गगन पर बादल

नाच रही कोई बाँध के पायल

धरा का है श्रृंगार अनोखा

बाट जोहती लगा के काजल

उल्लासित हैं चंचल नयन

झूम रहे फूलों के दल-बल  

वो क्या जाने मन की बातें, हवा में घुलतीं अनगिन जज्बातें

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते


तृण पात सारे डोल रहें हैं

मन की परतें खोल रहें हैं

धीरे धीरे मद्धम मद्धम

कानों में कुछ बोल रहें हैं

बूंदों से आह्लादित मन

जंजीरें कितनी तोड़ रहे हैं

खुल रहे मन के बंधन आज, झींगुर प्रिय के गीत सुनाते

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते


काली बदरिया जिसे झूम के गाती

बूंदों लिखी वो पिया की पाती

कल-कल करती बारिश की बूंदे

कभी मचलतीं, कभी शरमातीं

आँगन सारा नाच रहा

नाच रहे हैं दिया बाती

कहीं खुले हैं कुछ झरोखे, पिया की बातें याद दिलाते

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते 


(रचनाकार - शिवनाथ कुमार)

मंगलवार, 24 जून 2025

दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

 


    
                                                        (फोटो गूगल से साभार)



बादलों का गर्जन, नभ विशाल गूँजा है
दिन ने ओढ़ा तमस, मन जा कहीं उलझा है  
खुल रही गांठें अंतस की, एक पूरी एक आधी है  
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

तेज बहती हवाएँ, दिल का इम्तिहान लेती हैं
जड़ बने पत्थर, भीगते हुए कुछ कहती हैं  
सिसकियाँ बह गयी पानी संग, दर्द जो काफी है  
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

रिस रिस कर बूंदे, अभी पत्तों से गिर रहीं हैं
धीमी धीमी सी आवाज, कानों में घुल रहीं हैं
तुम मिलो तो शांत हो, अंदर बेचैनी की आँधी है
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है

शाम का श्याम भीगता, कहीं बांसुरी बजा रहा है
भटका राही कहीं कोई, एक राह दिखा रहा है  
लौकिक-अलौकिक सब भीगे, नदी किनारे माझी है
दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है 

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