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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

नारी, तुमसे होता जग यह पूरा

(फोटो गूगल से साभार)



मंद समीर सी चलने वाली 
नदी सी कल कल बहने वाली 
जहाँ दिल दरिया और मन समंदर
करुणा और ममता का सागर 
तुम ना हो तो जग अधूरा
नारी, तुमसे होता जग यह पूरा

तुम माँ, तुम भगिनी
तुम बेटी, तुम अर्द्धांगिनी 
हर रूप तुम्हारा अद्भुत है
प्रेम, वात्सल्य, दया, त्याग
सब तुम्हारे पर्यायवाची
सब तुम्हारे ही रूप हैं 

तुम रानी लक्ष्मीबाई 
तुम राणा की पन्ना धाय
तुम चितौड़ की पदमिनी 
तुम वीरांगनी, तुम ओजस्विनी 

तुम इंदिरा सी नेतृत्व हो 
तुम कल्पना की उड़ान
तुम राष्ट्र शक्ति हो 
तुम देश का स्वाभिमान 

धरा से गगन तक
बस तुम्हारा विस्तार है 
नारी शक्ति, नारी संबल 
तुमको शत शत नमस्कार है !!


मंगलवार, 15 जनवरी 2019

जिंदगी तेरा मेरा रिश्ता बड़ा अजीब है

(फोटो गूगल से साभार)


जिंदगी तेरा मेरा रिश्ता बड़ा अजीब है
कभी तुम मुझे देख कर हँसती  हो 
तो कभी मैं तुम्हें देख कर हँसता हूँ 

संग संग तुम्हारे चलना बड़ा अनोखा है
कभी तुम मेरे पीछे होती हो 
कभी मैं तुम्हारे पीछे होता हूँ 

तुम हो क्या, समझना मुश्किल है जरा 
हर रूप अलग सा है तुम्हारा 
हर पल तुम संग विचित्रताओं से भरा  

तुम अहसास हो कभी, तो कभी आभास हो
तुम नीम हो कभी , तो कभी मिठास हो
बेशक एक पहेली हो, पर मेरे लिए ख़ास हो 

जिंदगी, हम तुम सदा ऐसे ही लड़े झगडे
हँसे हँसाएँ आपस में और कभी रूठे मनाएँ
पर साथ अनूठा बना रहे, ऐसे ही बस चलते जाएँ



बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

खुली किताब



(फोटो गूगल से साभार)


मैं एक खुली किताब
जिसने भी मुझे पढ़ा
मुझे भिगोता गया 
अपने आँसूओं से 

जिस वजह से 
मेरे शब्द 
धुंधले हो गए हैं 
मुझे पढ़ने में अब
लोगों को बड़ी मुश्किलें होती है 
शब्द , स्पष्ट नहीं दिखते
और कहीं कहीं तो 
पूरा का पूरा 
पृष्ठ ही धुंधला है

मुझे  पढ़ने वाले
अब समझ नहीं पाते मुझे
अनुमान से शब्द अधूरे, पूरे करते हैं 
पर वो शब्द 'अधूरा' ही रह जाता है
और शायद 'सत्य' भी 

कभी कभी 
खुली किताब होना भी
अस्तित्व के लिए 
खतरा बन जाता है
जाने अनजाने में ही
बहुत कुछ मिट जाता है 
बड़ा ही पीड़ादायक होता है फिर
खुद को संभालना 
मैं और क्या कहूँ तुमसे
तुम मुझे ही देख लो !




मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ

(फोटो गूगल से साभार)

चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
तबियत में उतार चढ़ाव लाजिमी है 
जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ 

हसरतें कई बह जाती हैं
रेतीली लहरों के साथ साथ 
उम्मीदें कई उड़ जाती हैं
बहती हवाओं के साथ 
पर मजबूर हूँ दिल से ए जिंदगी
मुस्कुराने की आदत है, मुस्कुराता चलूँ
हसरतों का कारवां फिर बनाता चलूँ 

कोरे कागज़ पर लिख कर 
क्यूँ फेंक दे फिर उसे मोड़ माड़ कर 
तल्खियां रिश्तों में आम है
क्या मिला है बगिया उजाड़ कर  
उड़ाने और लपेटने का पतंग
सिलसिला ये लाजवाब है
रिश्तों को संभालना जो सीख ले
वो दुनिया में बेमिसाल है
अपनापन सा कुछ मिठास मिलाता चलूँ
रिश्ता इंसानियत का और बनाता चलूँ 

बिखरना और टूटना मानता हूँ
पर टूट कर जुड़ना भी जानता हूँ
अमावस का आना तय है हर महीने
ख्याल में पूणर्मासी के रातें गुजारता हूँ 
सीखने को बहुत कुछ है जिंदगी में
पर ढाई आखर की महता पहचानता हूँ 
हैं अंधेरों से बातें करती कई राहें
उन राहों पर दीप जलाता चलूँ 
जिंदगी तुम बहुत खूबसूरत हो
चलो तुम्हें तुम्हारा दीदार कराता चलूँ 



सोमवार, 28 अगस्त 2017

जमाना जिसके लिए आज मूक बधिर है

(फोटो गूगल से साभार)

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है 

गड्ढे हैं आँखों के नीचे
उन गड्ढों में तैरता 
कोई छंद है 
आँखों से निकल कर 
एक कविता बह रही है 
फटे चीटे कपड़े बदन पर
दिल में कोई जख्म है, पीर है
शाम की विश्राम करती राहों पर
चल रहा कोई फ़कीर है

अँधेरा होने को है 
चाँद निकाला है उसने
अपने बाईं तरफ वाली 
ऊपरी जेब से
रख लिया है हाथों में
दर्द की तनहा रातों में 
गीत गाता हुआ
तोड़ रहा  
ख़ामोशी की जंजीर है 
पर ना जाने क्यूँ  
जमाना जिसके लिए 
आज मूक बधिर है 

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है !

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे

(फोटो गूगल से साभार) 


लगा सुनाने बारिश का पानी
भीत छुपी थी कोई कहानी
बहने लगा है संग संग जिसके
यादें जो हो चुकी पुरानी
छप्पक छईं पानी में उतरा कोई  
लौट आई फिर अल्हड़ जवानी 
रूठे पिया को चला मनाने, भीग रहा मन मीत वही ढूंढें 
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 

धमक धमक बादल हैं गरजे
चमक चमक बिजली है चमके
काली चादर ओढ़े अम्बर
खोल रहीं हैं मन की परतें 
सिली सिली सी दिल की अंगराई
चेहरे पर इक मुस्कान है लाई
पिया के होने का अहसास, धरती अम्बर इक डोर में गूंदे   
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 


डाली डाली, पत्ता पत्ता 
वसुधा का अंग अंग है भीगा
काली कजरारी आँखों में
प्रेम का सुन्दर रंग है दिखा
सुर्ख भीगे अधरों पर 
नाम प्रीत का आकर टिका
अम्बर सा विस्तार पिया, साकार होती दिल की उम्मीदें  
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 


मंगलवार, 19 जुलाई 2016

मन श्रावणी हो उठा है जाग उठा फिर वृंदावन

(फोटो गूगल से साभार)


आँख मिचौली करता बादल
प्रिये, खेल रहा तेरी आँखों में 
अभी अभी बरसा है सावन 
लिपट सिमट तेरी बाहों में
दिन रात किनारे बैठे दोनों, देख रहे यह दृश्य मनभावन
मन श्रावणी हो उठा है, जाग उठा फिर वृंदावन 

बूँद बूँद प्रिये सजा रहा 
चूड़ी कंगन बिंदिया टिकुली 
मेघ घना बालों में उमड़ा
मेह सजी नथनी और बाली
श्रृंगार अनूठा शोभित मुखमण्डल, प्रीत भरे ये रीत नयन 
मन श्रावणी हो उठा है,जाग उठा फिर वृंदावन

मयूर पंख सा विस्तार लिए 
मन मगन आह्लादित है 
चंचला चपला कामिनी रमणी 
दिल देख प्रिये आनन्दित है 
टूट रहा अब हर बंधन जैसे, बँध रहे दो अंतर्मन 
मन श्रावणी हो उठा है,जाग उठा फिर वृंदावन



शुक्रवार, 20 मई 2016

पहला और दूसरा






पहला शांत है 
पर चेतन, जागृत
दूसरा अशांत है
उद्वेलित 

कोशिश कर रहा  
दूसरा  
पहले को परेशान 
करने की 

पर पहले को 
गुस्सा नहीं 
प्यार आ रहा  
दूसरे पर 

पता है पहले को  
कि दूसरा नादान है 
चंचल है 
यही सोच 
कोई प्रतिक्रिया नहीं 
बस शांत बैठा है पहला 

कुछ देर बाद 
दूसरा खुद शांत हो जाता है 
और पहला 
मुस्कुरा रहा होता है 
चुपचाप 

जो किसी ने पूछा
दोनों से 
परिचय उनका 
पहले ने बताया 'दिल'
दूसरे ने 'मन'





शनिवार, 26 दिसंबर 2015

राह दिखाएँ खुद को

(फोटो गूगल से साभार)



तमस में घिरते 
व्याकुल मन को 
देख रहीं 
अदृश्य निगाहें (मन की)
दीपक लेकर चलता कोई 
पर नहीं खुलती हैं 
बंद निगाहें 

सृजन और विध्वंस 
के मध्य 
दो पाटी में पीसता मन 
मन की व्याकुलता
बाँध ना पाया 
धरा की अपनी सीमाएँ 

निज मन में ही 
शक्ति अकूत 
बाँध सके जो खुद को 
घोर  तमस में दीप जलाए 
राह दिखाएँ खुद को 


गुरुवार, 19 नवंबर 2015

राधे तेरे इंतजार में श्याम अकेला बैठा है

(फोटो गूगल से साभार)


हर्फ़ हर्फ़ गुजरो मेरी कविता से  
और हर शब्द सोना हो जाए
बस लिख दूँ रौशनी 
और रौशन हर इक कोना हो जाए 

फड़फड़ाते पन्नों को 
ना जाने कौन सी हवा लगी है 
तेरी आरजू बन मेरी कविता 
अरमां लिए बस उड़ने लगी है

नीला हुआ करता था कभी 
जो दावत, आज गुलाबी है 
बहके हुए से हैं हर शब्द 
शब्द शब्द शराबी है

भीग रहा मेरी कविता का आँगन 
मन वृंदावन हो बैठा है
युग बदला है देखो कैसा 
राधे तेरे  इंतजार में 
श्याम अकेला बैठा है 


मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मुस्कुराएगा जो सदा


(फोटो गूगल से साभार)


वह तमाशबीन नहीं बना रहा 
औरों की तरह 
उठा और चढ़ गया आसमां पर 
बन कर सूरज चमकने लगा 

रात भर जहाँ नाउम्मीदी पसरी थी  
वहाँ नव ऊर्जा बन बहने लगा 
नव उत्साह लिए साँसों में 
बागों में महकने लगा 

बिना मुश्किलों से डरे 
चुनौतियों को हुंकार भरता  
हर कदम  हर सफर 
हर साँस हर डगर 
हर प्राण ओज भरता 

हर भेदभाव से परे 
सहृदय हर किसी से
मानवता का अर्थ गढ़ता 
एक पथ प्रदर्शक, मार्गदर्शक  
आदर्श की नव नींव रखता 
वो चलता रहा, बस चलता रहा 

वो कभी थका नहीं 
वो कभी झुका नहीं 
क्या कुछ वो गढ़ गया 
पर कभी रुका नहीं 

यह सूरज वह सूरज नहीं 
है अस्त जो हो जाता  
यह, वह सूरज है 
जो हर दिल में
है सदा उदित रहता
मुस्कुराता है सदा 
मुस्कुराएगा जो सदा  


शत शत नमन !!

शनिवार, 13 जून 2015

आधा मन

( फोटो गूगल से साभार )  


कदम दर कदम 
संग चलता है मेरे 
तुम्हारा  'आधा मन'

अक्सर हाथ की 
आड़ी तिरछी रेखाओं में 
ढूंढता हूँ तुम्हारा  
बाकी बचा 'आधा मन'

पर हर बार पाता हूँ 
कुछ अलग सा 
हाँ, बिलकुल अलग  … 
जैसे कुछ कपोल अरमां
और तल्ख़  धूप  में 
लिपटा एक टुकड़ा
बारिश का

मेरे माथे की तीन रेखाएँ 
आज भी जिक्र छेड़ती हैं तुम्हारा
अक्सर आधी रात को 
और आज भी बेवजह 
मुस्कुरा देती हैं 
तुम्हारे 'आधे मन' की 
उस मुस्कुराहट  से 

तुम्हारा भी 'आधा मन' 
कभी पूरा ना हो पाया 
हो सके तो ले जाओ 
अपना 'आधा मन'
ताकि तुम पूर्ण हो जाओ
या फिर दे जाओ 
बाकी बचा 'आधा मन '
ताकि 'हम' पूर्ण हो जाएँ

इसी इंतजार में 
प्रतीक्षारत 
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा  
वही .... 'आधा मन' !




शुक्रवार, 15 मई 2015

झुकी पलकें


(फोटो गूगल से साभार)


झुकी पलकें 
बड़ी ख़ामोशी से 
लम्हा लम्हा 
सहेज रही है 

ओस की एक बूंद 
आ टिकी है पलकों के कोर पर 
और शबनमी हो गयी आँखे 
बस बंद ही रहना चाहती हैं 

रात शतरंज की बिसात बिछाए 
बैठा है 
शह और मात के बीच 

अभी अभी खामोशी टूटी है 
कुछ गिरा है 
जमीं पर आकर 

जो देखा तो 
चाँद बिखरा पड़ा है 
टुकड़ों में 
और पलकें 
अभी भी 
झुकी हैं 
समेटे कुछ ख्वाब 
अपनी परछाईयों में 




बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ये बिंदिया



(फोटो गूगल से साभार) 




तुम्हारी आँखों में 
सवाल हजार हैं
तुम्हारे माथे की बिंदिया 
उनके जवाब हैं 

तुम बोलो ना बोलो 
ये बिंदिया बोल देती है 
तुम्हारे सारे जज्बात 
यूँ ही खोल देती है 

तुम्हारे रंज 
गिले शिकवे 
सब चुपचाप सुनती है 
तुम्हारी बिंदिया ही तो है 
जो माथे की गहन
रेखाओं के बीच 
खुशियाँ ढूँढ लेती है 

यही बिंदिया है 
जो कर जाती है
हर शाम पूनम 
भर रही होती जो उजाला 
मन में, जिंदगी में 
धीरे धीरे 
मद्धम मद्धम 





शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

भीगी पलकें


भीगी पलकों से 
उनकी मुस्कुराहटें 
गीली हो चली 

खामोशी और मौन में 
भीगता रहा दो मन
बड़ी देर तलक 

दिल की सारी शिकायतें 
सारे गिले शिकवे  
बह गए कहीं 

रात के 
आसमां पर 
काले बादल थे 
बस थोड़ी देर पहले 

अभी चाँद 
उफ़क़ कर 
आ गया है वहाँ 
मुस्कुराते हुए  


मंगलवार, 18 नवंबर 2014

बोलता पत्थर !


(फोटो गूगल से साभार)


कितनी ठोकरें खाई थीं
राह में पड़े थे जब 
किसी ने उठा 
रख दिया मंदिर में
और समय बदल गया है अब
  
जो मारते थे ठोकरें 
खुद पूजने आ गए
खाया था जिनसे चोट  
पैरों पर मेरे 'वो'
कितने फूल चढ़ा गए  !


सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

माँ का आँचल प्यार भरा !

(फोटो गूगल से साभार)




माँ तेरे यादों की हर चीज 
समेट कर रख दी है 
सहेज कर 
मन में 
जो कभी पानी 
तो कभी 
बादल बन 
बरस जाती हैं 
मन में ही 

मैं सहेजता हूँ उन 
बूंदों को 
मैं बहने नहीं देना चाहता 
उनको 
उन बूंदों में भीगना 
अच्छा लगता है 

माना मन रोता है 
कई बार 
तुम्हें याद कर के 
पर तेरी इन यादों से 
मन सजीव हो उठता है 
जहाँ मायावी  
मुस्कान और आँसू
अपना अस्तित्व खो देते हैं 
और मन 
विश्राम पाता है 
बिलकुल वैसे ही जैसे  
विचलित जल तरंगों को 
कोई किनारा मिल गया हो 
शुकून भरा 
जैसे किसी बालक को मिल गया हो 
माँ का आँचल 
प्यार भरा !


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

कुछ रात उधार लिया था मैंने !

(फोटो गूगल से साभार) 



पिछली दिवाली पर 
कुछ रात उधार लिया था मैंने  

केशुओं की कांति 
चेहरे का उजाला 
आँखों में सजी 
भावों की रंगोली 
सब अद्वितीय था 
प्रेम के लिए 
प्रेम का श्रृंगार किया था तुमने 
और कुछ रात उधार लिया था मैंने 

उस रात 
हाथ की लकीरें 
राहें बनी थीं 
और सजे थे 
आशाओं के दीये 
उन राहों पर 
फिर भटकते क़दमों को 
अपने क़दमों का साथ दिया था तुमने 
और कुछ रात उधार लिया था मैंने

कुछ बातें थी 
मौन सी 
जो मुखर हुए जा रही थी 
दिवाली के आसमां पर बिखरकर
और कुछ लफ्ज थे 
जो फुलझड़ियों की तरह 
बिखर रहे थे नीचे धरा पर 
अपने कुछ हँसते जज्बात दिए थे तुमने 
और कुछ रात उधार लिया था मैंने 

होता है उजाला अब 
मेरा हर दिन  
उस रात से 
बनती है मेरी हर बात 
अब उस रात से 
उसे स्वप्न कहो 
या कुछ और 
गीली धूप, भीगी मुस्कुराहटें 
और बहुत कुछ  
मिलता है उस रात से 
वो रात, अब मैं लौटा नहीं सकता तुम्हें 
जो पिछली दिवाली, उधार लिया था मैंने !





बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

पशुता मर गयी !

(फोटो गूगल से साभार)



सुना है 
एक पशु की 
बलि दी  
मनुष्यों ने 

और 
उसके बाद 
मनुष्यों के भीतर का 
इंसान   
जाग उठा  
और  अंदर की 
पशुता 
मर गयी !



गुरुवार, 4 सितंबर 2014

आखिर कौन था वो ?



(फोटो गूगल से साभार)



कभी कभी ठहर जाता हूँ 
आईने के सामने आकर 
मेरा प्रतिबिंब नहीं दिखता 
दिखता है कुछ और

तीन खीचीं लकीरें 
मेरे माथे पर 
और आँखों के नीचे 
सूनापन लिए गहरा अन्धकार 
कुछ और ही 
बोल रहा होता है 

इतना उदास सा चेहरा 
कब हुआ ऐसा !
पता नहीं चला 
और क्यूँ !
यह भी अज्ञात 

फिर आभास होता है मुझे  
कोई पीछे खड़ा है मेरे 
मुस्कुराता हुआ 
मेरे ऊपर  
(शायद 'मैं' ही हूँ )
मैं मिलता हूँ उससे 
और अब 
आइने में 'मैं' हूँ 
कोई और नहीं
.
.
आखिर कौन था वो ?


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