रात के ११.४५ बजे हैं और मोबाईल पर एक नाम फ़्लैश हो रहा है - रोहित ... कॉलिंग । संध्या अभी तक जाग रही है । भला मेट्रो सिटीज में रात को इतनी जल्दी कौन सोता है । कुछ सोच रही थी संध्या और और कुछ देर पहले व्हाट्स एप पे उंगलियाँ टाइम पास कर रही थी । फेसबुक पर अभी अभी एक स्टेटस डाला था और १० मिनट के अंदर १३ कमेंट्स ४७ लाइक्स आ चुके हैं । मोबाईल साइलेंट मोड में रख थोड़ा बालकनी में मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए सिगरेट के धुएँ उड़ाए जा रही थी । या यूँ कहे की अब यह उसकी रोज की आदत बन चुकी है । बिना सिगरेट के नींद कहाँ आती है । आदत से लग गयी है उसको । रोहित .... कॉलिंग अभी तक स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा है । ३ मिस्ड कॉल और उसके बाद मोबाइल भी चुप हो गयी । सिगरेट के कश लेने के बाद संध्या ने मोबाइल की चुप्पी तोड़ी । ' ३ मिस्ड कॉल्स .... रोहित ' देख संध्या ने मोबाइल के बटन दबाए । थोड़ी ही देर में रोहित की मोबाइल की घंटियाँ बजने लगी । रात के लगभग १२.३० बज चुके हैं । ' क्या हुआ रोहित, क्यों कॉल किया अभी …… मैंने तुम्हें मना किया था ना, कॉल नहीं करने को, फिर क्यूँ किया कॉल ' - संध्या कुछ ज्यादा ही सख्त लहजे से बोली । ' अरे संध्या मेरी बात तो सुनो, तुम ऐसा कैसे कर सकती हो …… तुम समझने की कोशिश क्यूँ नहीं करती .... संध्या आई रियली लव यू ' - और ये बोलते बोलते रोहित की आवाज बैठ सी जाती है । 'बट .... आई डोन्ट लव यू एंड आई नेवर लव्ड यू , ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है रोहित .... ' । 'तुम्हे मेरी बात बुरी लग रही होगी पर सच्चाई यही है कि हमलोग एक अच्छे दोस्त हो सकते हैं पर एक अच्छे लाइफ पार्टनर नहीं ', संध्या यह कहते हुए चुप हो जाती है। 'क्यूँ नहीं हो सकते एक अच्छे लाइफ पार्टनर , आखिर क्या कमी है मुझमें, पढ़ा लिखा हूँ और एक अच्छी जॉब है मेरे पास और दिखने में भी उतना बुरा नहीं हूँ और मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें बहुत खुश रखूँगा ' , रोहित पूरी तरह से आवेग में बहा जा रहा था । संध्या बीच में ही टोकती हुई .... 'रोहित ऐसी बात नहीं है, मुझे पता है कि तुम एक अच्छे दोस्त ही नहीं एक अच्छे इंसान भी हो , लेकिन सच बोलूँ रोहित तो मैं तुम्हारे काबिल नहीं , आखिर तुम्हें मेरी बुराईयाँ क्यूँ नहीं दिखती … तुम .... तुम एक सीधे सादे इंसान हो जिसे किसी चीज की बुरी लत नहीं है और मैं एक ऐसी लड़की हूँ जो दिन रात शराब और नशे में धुत रहती है …… तुम और मुझमे ऐसा क्या है जो हमें एक कर सके ' , और यह बोलते हुए एक खामोशी कुछ सेकंड्स के लिए खींच जाती है दोनों के बीच । रोहित ने चुप्पी तोड़ते हुए बोला ' प्यार … 'प्यार' है हम दोनों के बीच जो हमदोनों को एक कर बांधे रखेगी .... और तुम संध्या , तुम्हें अपनी अच्छाई क्यों नहीं दिखाई देती …… माना कि तुम्हें नशे की आदत है और इसकी वजह से यदि तुम मुझसे दूर रहना चाहती हो तो यह गलत है … विश्वास मानो संध्या मैं जहाँ तक तुम्हें जानता हूँ तुम मेरे लिए सबसे बेस्ट हो '। ' याद है मैं एक बार तुम्हारे साथ पार्क गया था और तुमने वहां एक गरीब बच्चे को अपनी गोद में ले उसका माथा सहलाया था और फिर उसे एक आइसक्रीम खरीद कर दी थी और वो बस तुम्हे स्नेह भाव से देखता रहा था ,,,, मैं उस संध्या को पाना चाहता हूँ ' । ' और तो और उस दिन अस्पताल में तुमने उस गरीब को अपने पर्स के सारे पैसे निकाल कर दे दिए थे जो अपनी बेटी के इलाज के लिए वहां आया था पर उसके पास पैसे की कमी हो चली थी ' । ' संध्या मैंने तुममें ऐसी कितनी ही अच्छाईयां देखी है और सबसे बड़ी अच्छाई कि आज भी तुम मेरे भले के लिए मुझे ठुकरा रही हो ' । ' संध्या नशे की आदत आज ना कल छूट जाएगी पर अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो फिर ऐसा होगा जैसे मैंने ऊपर वाले से मिले एक अनमोल उपहार को छोड़ दिया है ' । ' संध्या तुम मेरे लिए एक अनमोल उपहार हो .... प्लीज तुम ऐसा मत सोचना कि बस मैं तुम्हें पाने के लिए कुछ भी बोले जा रहा हूँ ,,, ये मेरे अंदर की सच्चाई हैं संध्या ,,,, प्लीज तुम ना मत बोलो ' । संध्या यह सब खामोश सुने जा रही थी ,,, बिलकुल खामोश और फिर उसने कहा - 'चलो रोहित बहुत बोला,, जा कर सो जाओ और मुझे भी नींद आ रही है ' । फिर रोहित ने टोकते हुआ कहा , 'पर .... कुछ तो बोलो … ' । रोहित के कुछ बोलने से पहले संध्या ने कॉल कट किया और बिछावन पर लेट कुछ सोचने लगी । ' रोहित … कालिंग ' स्क्रीन पर फिर से फ़्लैश हो रहा है । थोड़ा मुस्कुरात हुए संध्या ने कॉल कट किया और आँखें बंद कर कुछ सोचते हुए अपनी पलकें बंद कर नींद का इंतजार करने लगी … ।
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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015
रविवार, 8 अप्रैल 2012
रिक्शावाला
आज शर्मा जी फिर से ऑफिस जाने के लिए लेट हो रहे थे , और इसीलिए रिक्शेवाले को जल्दबाजी दिखाते हुए बोले " क्यों भई , कुछ खाया नहीं क्या .... थोड़ा जल्दी चलो ..... ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ ... "| रिक्शेवाले ने कुछ नहीं कहा , बस जैसे तैसे रिक्शे को खींचे जा रहा था | अभी १० ही बजे थे फिर भी हवा में गर्मी थी और ऊपर से सूरज की रौशनी भी तीखी हो चली थी , ऐसा लग रहा था मानो ये सब उसका इम्तिहान ले रहे हों | पर पता नहीं उसे इसका एहसास भी था या नहीं | बदन पर एक फटी सी गंजी और कमर पर आधी लिपटी गंदीली सी लूँगी | पसीने से भींगे उसके बदन को देखकर , उसकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था | पर शर्मा जी को ऑफिस जाने की जल्दी थी , सो उन्होंने रिक्शेवाले को थोड़ी तेज गति से रिक्शा चलाने को कहा | वैसे भी वो लगातार ३ दिन से ऑफिस के लिए लेट हो रहे थे और आज .... फिर से लेट नहीं होना चाहते थे | डाकखाने के पोस्टमास्टर ने उन्हें कल ही तो जमकर डाँट लगाई थी | डाँट भी अकेले में लगाते तो चलता , उन्होंने तो ऑफिस के कर्मचारियों के बीच उनकी जमकर ले ली थी .....| यही बात थी कि आज शर्मा जी फिर से लेट नहीं पहुँचना चाहते थे | मन ही मन बुदबुदाए जा रहे थे " कमबख्त ये रिक्शावाला भी ना .... मेरी तो किस्मत ही फूटी है .... आज तो यह मुझे फिर से लेट करवाएगा ...... कमबख्त , थोड़ा तेज चला लेगा तो इसके बाप का क्या चला जाएगा ! " वो अभी इसी सोच में थे कि पता नहीं क्यों रिक्शेवाले का नियंत्रण रिक्शे पे से खो गया और रिक्शा बगल के एक पेड़ से जा टकराया | रिक्शावाला जमीन पर गिरा , बेहोश पड़ा था और शर्मा जी स्तब्ध , आखिर ये सब एकाएक जो हुआ ... | उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि आखिर हुआ किया | लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी | लोगों की मदद से , पानी के कुछ छींटे उसके चेहरे पे डाले गए | वह उठा , फिर उसे पास के एक पेड़ के नीचे छाँव में बिठाया गया | कुछ देर तक शांत रहने के बाद शर्मा जी की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला "दो दिनों से कुछ ठीक से खाया नहीं साहब ...... बचिया भी बीमार है ..... दिन भर का सारा कमाया धमाया उसके ईलाज और दवा दारु में ही चला जाता है .....सही है कि भगवान भी आजकल अमीरों के लिए ही हैं , हम गरीबों के सब्र का तो वह बस इम्तिहान ही लेता रहता है ....", ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पे एक गहरा सवाल लिए उदासी छा गई थी, जिसका जवाब किसके पास था, पता नहीं | ना जाने फिर शर्मा जी को क्या हुआ , उन्होंने उस रिक्शेवाले को बगल के होटल में ले जाकर पहले तो भर पेट भोजन करवाया और फिर कुछ पैसे उसके हाथ में देते हुए बोले "रख लो इसे , जब कभी भी मन करे तो लौटा देना ..." | रिक्शे वाले ने बड़ी कृतज्ञ नज़रों से शर्मा जी की तरफ देखा | दोनों की नज़रों ने पल भर में एक दूसरे की आँखों में कुछ पढ़ लिया था ....| फिर शर्मा जी वहाँ से पोस्ट ऑफिस की ओर पैदल ही चल पड़े |
आज फिर से लेट होने के कारण , पोस्टमास्टर ने उन्हें फिर से सुनाने शुरू कर दी , पर उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया, ..... शायद पोस्टमास्टर की बातें आज उनतक पहुँच नहीं रही थी | वो अपने टेबल के ओर बढे , कुर्सी पर बड़े इत्मीनान से बैठे, चश्मा उतारा, एक लम्बी साँस लेते हुए आँखें बंद की और फिर गर्दन कुर्सी पर पीछे की ओर झुकाया, थोड़ा आराम कि मुद्रा में ........ फिर हल्की सी मुस्कुराहट लिए किसी सोच में डूबते ही चले गए ........!!
गुरुवार, 5 जनवरी 2012
लोरी
मुन्ने का माथा गोद में रखकर सहलाते हुए माँ लोरी गाए जा रही थी " चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा । सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा ...." | रात का समय और बिजली गुल थी , ऊपर से गर्मी | लेकिन माँ की मीठी लोरी इन सब पर भाडी पड़ रही थी , मुन्ना बस सारे चीज भूलकर लोरी सुने जा रहा था | हवा भी शांत होकर मानो लोरी का आनंद ले रही हो | एक अजीब सी मिठास , प्यार और शुकून की अनुभूति के साथ वह आसमान को निहार रहा था | बाल मन काफी निर्दोष होता है , मुन्ने ने बड़े प्यार से पूछा कि माँ ये तारे कहाँ से आते हैं , इतने सारे तारे .... (कहते हुए माँ की ओर देखने लगा ) | माँ ने माथा सहलाते हुए कहा "बेटा , हर किसी को एक दिन भगवान अपने पास बुलाते हैं और जो लोग भगवान के पास होते हैं वो तारे बनकर दूर से ही हमें देखते रहते हैं "
और ऐसा कहते हुए वह फिर से लोरी सुनाने लगी ....
"चंदा मामा दूर के
पूआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ने को दे प्याली में
प्याला गया फूट
मुन्ना गया रूठ "
लोरी सुनते हुए ना जाने कब मुन्ने को नींद आ गई |
आज फिर से वह उन तारों के निहार रहा था लेकिन ....... अकेला ...... | गर्मी से उसका हाल बुरा था |
उन तारों के बीच उसकी निगाह किसी को ढूँढ रही थी, शायद अपने अतीत को, अपनी ......
और ऐसा कहते हुए वह फिर से लोरी सुनाने लगी ....
"चंदा मामा दूर के
पूआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ने को दे प्याली में
प्याला गया फूट
मुन्ना गया रूठ "
लोरी सुनते हुए ना जाने कब मुन्ने को नींद आ गई |
आज फिर से वह उन तारों के निहार रहा था लेकिन ....... अकेला ...... | गर्मी से उसका हाल बुरा था |
उन तारों के बीच उसकी निगाह किसी को ढूँढ रही थी, शायद अपने अतीत को, अपनी ......
गुरुवार, 28 अप्रैल 2011
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
शीर्षक : आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
लोकल ट्रेन अपनी धुन में चली जा रही थी | अपनी सीट पर बैठे हिमेश कुछ सोच रहा था | उसके हाथ में एक लेटर था जिसे वह कभी - कभी खोल कर पढ़ लेता था और फिर कुछ सोचने लगता था | आज उसकी नजरें भी ट्रेन पे चिपके उस पोस्टर पर जा जा कर ठहर जाती थी जिसपे लिखा था "घर बैठे कमाइए १२ से १५ हजार " (ऐसे पोस्टर आपको मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में बहुत जगह मिल जाएँगे) | रोज की तरह वह ट्रेन से उतरा और रूम के लिए चल पडा |
हिमेश रूम पे पहुँचा तब उसके हाथ में लेटर देखकर अमरीश पूछ बैठा " ये तेरे हाथ में क्या है !"
हिमेश ने बड़ी शांति से कहा "वही लव लेटर है , ऑफिस की तरफ से "
"लव लेटर ! वो भी ऑफिस की तरफ से | मजाक मत कर ला दिखा क्या है "
"हाँ, हाँ देख ले , तुझे भी ये मिल ही जाएगी १-२ दिन में " ऐसा कहते हुए हिमेश ने लेटर उसके हाथ में थमा दिया |
(वस्तुतः हिमेश और अमरीश एक ही ऑफिस के दो अलग अलग ब्रांचों में काम करते हैं , और दोनों एक साथ ऑफिस के दिए बैचलर्स रूम में रहते हैं |)
लेटर पढ़कर अमरीश भी थोड़ी देर के लिए शांत हो गया |
"ऐसा कैसे होगा , एक तो हमारी सैलरी कम है , ऊपर से ये इतना पैसा रूम के किराए के तौर पे काट लेंगे , तो फिर हमारे पास बचेगा क्या !"
(वस्तुतः उस लेटर में किराए बढ़ने की बात थी , पहले उन्हें काफी कम किराया देना पड़ता था , सो वो बड़े आराम से मस्ती में रह रहे थे, हालांकि उनकी सैलरी कम थी पर किराया कम कटने की वजह से उन्हें प्रॉब्लम नहीं होती थी )
"यार , हम ये रूम छोड़ देते हैं और कहीं और देखते हैं "
"तेरे पास डिपोजिट के पैसे हैं , रूम छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं है पर नए रूम के लिए डिपोजिट भी तो भरना पड़ेगा ! " (हिमेश ने कहा )
(मुंबई जैसे शहर में आपको किराए के रूम में रहने के लिए पहले अच्छी खासी रकम डिपोजिट के तौर पे जमा करनी होती है )
दोनों इस मुद्दे पर सोच विचार कर रहे थे की आखिर वो क्या करें .....
हिमेश ने कहा " मैंने , कुछ नंबर (मोबाइल के ) नोट किये हैं , पार्ट टाइम जॉब के लिए | मैं सोचता हूँ बात करनी चाहिए "
अमरीश ने उसकी तरफ देखा "ये सब भी सही नहीं होते हैं, ऐसे ही बोलते कुछ हैं , करवाते कुछ और हैं | तुम जैसा सोच रहे हो उतना आसन नहीं है पार्ट टाइम जॉब करना "
हिमेश ने कहा "तो फिर क्या करें "
"कुछ नहीं चल बैठकर टीवी देखते हैं , टेंशन लेने से कुछ नहीं होने वाला | वैसे भी कहते हैं न की 'चिंता चिता के सामान है ' "
दोनों टीवी देखने बैठ गए | टीवी पर गाना आ रहा था....
"एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में
आबोदाना ढूँढता है , आशियाना ढूँढता है ................"
दोनों बस शांत बैठे गाने का आनंद ले रहे थे, बिना किसी टेंशन के ................... !!
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