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रविवार, 5 अगस्त 2012

आसमान के तारों को, तोड़ जमीं पर लाना है !

(फोटो गूगल से साभार)


"कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो...."
ये पंक्तियाँ उन मित्रों से मिलने के बाद मेरे जहन में सहज ही आ गईं... |  सही में यदि हौंसला बुलंद हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं | अपने इन मित्रों का जज्बा देखकर उन्हें बार बार सलाम करने को दिल करता है | अरे हाँ, मैंने तो बताया ही नहीं कि आखिर ये मित्र हैं कौन | ये ऐसे मित्र हैं जिनसे मेरी दोस्ती ज्यादा पुरानी नहीं है, बस दस दिन हुए हैं और उन्होंने मेरे मन पर गहरा छाप छोड़ा है | और आज फ्रेंडशिप डे पर अपने इन नए मित्रों के बारे में कुछ लिखने का मन हो रहा है, सो लिख रहा हूँ |  ये ऐसे मित्र हैं जिनके आँखों में तो रौशनी कम है या फिर बिलकुल ही नहीं है लेकिन दिल और मन दोनों असीम उजाले से भरा हुआ है| ये मित्र कंप्यूटर का प्रशिक्षण लेने आये थे, उस संस्था में जहाँ मैं
कार्यरत हूँ | प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य था - कंप्यूटर को उनकी पहुँच में लाना ताकि वो आसानी से कंप्यूटर पर काम कर सकें|  प्रशिक्षण दस दिनों के लिए था पर इन दस दिनों में उन्होंने जितना यहाँ सीखा उससे कहीं ज्यादा हम लोगों ने उनसे सीखा | उनके उत्साह और लगन को देखकर सच बोलिए तो दिल खुश हो गया, और तो और आप कभी भी उनके चेहरे पर जरा सी भी उदासी के भाव नहीं देख सकते |  हमेशा चेहरे पर एक मुस्कुराहट, एक संतुष्टि का भाव जो शायद ही हमारे और आपके चेहरे पर दिखे  |  ये मुस्कुराहट कितना कुछ सीखा गयी हमें | ऊपर से उनका जज्बा और उत्साह जीवन के प्रति, आशावादी सोच और  कुछ करने कि जीवट इच्छा  देखकर आप सहज ही अपने विषय में सोचने पर विवश हो जाएँगे | एक छोटी से बात बताता हूँ जो उनके अंदर के विश्वास को बताता है | एक प्रशिक्षु मित्र को मैं जी-मेल पर अकाउंट बनाना बता रहा था | अकाउंट बनाने के क्रम में एक जगह प्रोफाइल फोटो के लिए विंडो ओपन होता है | मैंने उससे मजाक में ही पूछा कि दोस्त यहाँ किसी हीरो का फोटो डाल दूँ ... सलमान खान की... | पता है फिर उसने क्या बोला ! उसने जो बोला वह सुनकर मुझे काफी ख़ुशी हुई | उसने बोला कि 'नहीं, उसकी फोटो नहीं मेरी फोटो डालो, वो हीरो कैसे हुआ .. हीरो मै खुद हूँ ... मैं तो लोकल में सफ़र करता हूँ , वो करता है क्या( हँसते हुए ..)! ' और आगे वो कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन बोला नहीं , हँसकर रुक गया | उसकी ये छोटी सी हँसी और छोटा सा वाक्य वास्तव में छोटा नहीं था, काफी बड़ी बात कह दी उसने ... हँसते-हँसते ही | मैं तो जरुर कह सकता हूँ कि सच में ये सच्चे हीरो हैं |  अब ज्यादा नहीं लिखूँगा, बस इतना समझिये कि इन मित्रों से मिलने के बाद मेरे मन में कुछ भाव उठे जिसे मैंने एक रचना में ढाल दिया और समापन समारोह में गाया भी | मेरी आवाज अच्छी नहीं फिर भी मुझे आज इच्छा हुई कि आपसे अपनी आवाज ( वास्तव में मेरे उन न भुलाए जाने वाले मित्रों की आवाज है यह, शब्द मेरे हैं भाव उनके हैं ) और अपना यह गीत शेयर करूँ | समय हो तो सुनियेगा जरुर ....|


चलिए तब तक के लिए नमस्कार और फ्रेंडशिप डे की बधाई व शुभकामनाएँ!!


मेरी आवाज अच्छी तो है नहीं पर अब जब सुनाना है तो सुनाना है, आशा करता हूँ कि आप सहयोग करेंगे :-)

(गीत : आसमान के तारों को, तोड़ जमीं पर लाना है)






आसमान के तारों को
तोड़ जमीं पर लाना है
आगे आगे हम बढ़ें
कुछ ऐसा कर दिखाना है

अंदर बहुत उजाला है
जिसने हमें संभाला है
पथ आलोकित होता अपना
पग जिधर भी हमने डाला है
अंतर्मन का दीप जला
अंधियारा दूर भगाना है

आसमान के तारों को...

बाधाओं से डरकर बोलो
कब हमने हिम्मत हारा है
बाधाओं से लड़कर देखो
जीत का सेहरा बाँधा है
हम इस युग के मीना है
हमें सिकंदर बन जाना है

आसमान के तारों को ...

अपने होठों की हँसी
हमें बहुत ही प्यारी है
इससे यारों देखो अपनी
बड़ी ही गहरी यारी है
हँसते हँसते जिंदगी का
हर इक कदम उठाना है

आसमान के तारों को ...

अंबर पर छा जाने को
नवगीत कोई अब गाने को
लालायित उल्लासित हैं
हम पुंज पुंज प्रकाशित हैं
परिभाषाएँ कई गढ़ ली हमने
अब राह में दीप जलाना है

आसमान के तारों को...

शनिवार, 14 जुलाई 2012

संभाल लो, संभल जाओ आज !

(फोटो गूगल से साभार)

 कुछ दिनों पहले हमारे देश के एक हिस्से में एक लड़की के साथ कुछ लोगों ने जो बदसलूकी की वो बड़े ही शर्म की बात है | आजादी के इतने साल बाद भी ऐसी स्थिति देखकर बहुत दुःख होता है | देश के कई अन्य हिस्सों से लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ ऐसे अमानवीय व्यवहार की खबर आए दिन अखबारों, समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल ही जाता है |  हमें बचपन में एक श्लोक पढ़ाया जाता था "यत्र नारी पूज्यते ,तत्र देवता रमन्ते" जिसका मतलब आपलोगों को तो पता ही होगा फिर भी मैं यहाँ लिख देता हूँ कि "जहाँ नारी की पूजा होती है वहीं ईश्वर का वास होता है " | अब पूजा का मतलब अगरबती और धुप दीप से पूजा करने से तो है नहीं  इतना तो सबको पता ही होगा |  ज्यादा लिखने का कोई मतलब नहीं बनता | लिखने वालों ने कितना लिखा और हमारी इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने गुवाहाटी वाली खबर को बड़े सक्रिय होकर दिखाया भी |  धन्यवाद और साधुवाद ! इस मीडिया को | कई 'पशु' वहाँ मौजूद थे ('पशु' का मतलब तो समझते ही होंगे आप) जो उस लड़की के साथ अपनी 'जाति' के हिसाब से बर्ताव कर रहे थे |  अब पशुओं से इंसानियत की आशा रखना ये तो मूर्खता ही है, बोलिए है की नहीं .... | कुछ 'पशुओं' को तो गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन अभी भी कुछ स्वतंत्र घूम रहे हैं | ऐसे पशु हमारे समाज और देश दोनों के लिए खतरा हैं | इनकी स्वतंत्रता और प्रशासन की निष्क्रियता दोनों एक ही सिक्के के दो  पहलू हैं | हाँ, हमारी पुलिस, प्रशासन और सरकार भी तभी सक्रिय होती है जब ये मीडिया सक्रिय होता है क्यूँकी सरकार के अन्य मीडियम (तात्पर्य 'माध्यम' से है )  तो काम करते नहीं, जंग लग चुकी है उनमें | सरकार की कोई गलती नहीं, गलती तो मीडिया की है जो इतनी देर बाद खबर दिखाती है | 'लाईव' दिखाते तो शायद सारे पशु अभी जेल में होते | मैंने कुछ गलत कहा क्या .... गलती के लिए माफ़ी चाहूँगा ! प्रशासन को कुछ कहना बेकार है क्यूँकी उनके कानों पर तो जूं रेंगने से रही |  और एक बात, ये तो देश के एक हिस्से में होने वाली घटना है जो मीडिया में आई और हमें पता चला, पर आए दिन ऐसी कई घटनाएँ हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में घटती रहती हैं | लड़कियों, महिलाओं के साथ ऐसे कई दुर्व्यवहार सुनने को मिल ही जाते हैं |  हमारे देश में जहाँ नारी नर से पहले आती है , जहाँ 'राम-सीता', 'कृष्ण-राधा' न कहकर 'सीता-राम' और 'राधे-कृष्ण' बुलाते हैं, जहाँ अपनी धरती को हम 'माँ' का दर्जा देते हैं वहाँ किसी भी नारी के साथ अमानवीय व्यवहार और उसे अपमानित करना एक तरह से भारत माता का अपमान है और हम सब के लिए शर्म की बात | कहीं ना कहीं हम आप भी इसके जिम्मेवार हैं (कहने का तात्पर्य 'आम इंसान' से है, अन्यथा ना ले), क्यों जरा सोचिये  .... सोचने के लिए मैंने आप पर छोड़ दिया !  बस अपनी कुछ पँक्तियों के साथ अपनी बातों को विराम देना चाहूँगा, शायद किसी की इंसानियत जाग उठे ......


(फोटो गूगल से साभार)

















ये कैसा दृश्य है                       
'मानवता' अदृश्य है
अभिशापित, कलंकित
हुई सी रात
मर गया था शहर
मर गए थे जज्बात
बेच आए थे 'वो' शर्म
एक अकेली पर
मिलकर सारे
दिखा रहे थे दम
शर्म करो बुजदिलों
शर्म करो शर्म
सुनता आ रहा हूँ कि
होता जहाँ नारी का सम्मान
बसते हैं वहीं भगवान
तेरे इस कृत्य ने
किया है भारत माता का अपमान
सुन लो 
ओ राष्ट्र के कर्ता धर्ता !
हो सके तो
अपना 'पुरुषार्थ' जगाओ
और नारी का 'सम्मान' बचाओ
और हे इंसान!
अगर तुम 'जिंदा' हो
और जाग रहे हो
तो 'सबूत' दो
आवाज लगाओ
हाथ मिलाओ
और ऐसे 'कुकृत्यों'
को जड़ से मिटाओ
तुम्हारे हाथों में है
भारत की 'लाज'
देर ना हो जाए कहीं
संभाल लो,
संभल जाओ आज !                                                        

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

श्री गुरुवे नमः




आज गुरुपूर्णिमा है और मैं कुछ लिखूँ ऐसी इच्छा बार बार मन में हो रही है |  जरा सोचिये जब आप से पूछा जाए कि आपके जीवन में गुरु का क्या महत्व है, तो मैं सोचता हूँ कि ज्यादातर लोगों का जवाब होगा 'बहुत ज्यादा' और यह सही भी है क्योंकि बिना गुरु के आप चल ही नहीं सकते | सोचिये जरा आपके अपने सबसे पहले गुरु के बारे में जिसका आपके जीवन में सबसे ज्यादा महत्व है  |  जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ  'माँ'  की,  सबसे पहली गुरु जो हमें चलना, बोलना सीखाती है |  हममें सही संस्कार भरती है, और तो और समय समय पर जब कभी हम कुछ गलत कर रहे होतें हैं या राह भटक रहे होतें है वही है जो हमें बिखरने से बचाती है | वो ही है जो हमारे व्यक्तित्व निर्माण की नीव रखती है | उस माँ को आज शत शत नमन !  उसी तरह पिता की भूमिका एक गुरु के रूप में अस्वीकार नहीं कर सकते | माता पिता के अलावे जिंदगी में ऐसे कई लोगों से मुलाक़ात होती है जिन्हें हम गुरु का स्थान दे सकते हैं | आज के सामाजिक परिपेक्ष्य में गुरु की भूमिका बदली है | केवल किताबी ज्ञान देने वाले गुरु नहीं कहे जा सकते | गुरु तो वस्तुतः तभी गुरु बनता है जब वो हमें सही संस्कार और ज्ञान से हमें समाज में ही नहीं बल्कि जीवन में ऊपर उठने में मदद करे | ऊपर उठने का आशय ज्यादातर लोग आर्थिक दृष्टिकोण से समाज में मजबूत होने के तौर पर देखते हैं, जबकि मेरा आशय इससे नहीं है | आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूँ | आज के समाज के बहिर्मुखी उत्थान के लिए गुरु की भूमिका काफी अहम हो जाती है, चाहे वो माता-पिता, अभिभावक या कोई और हो | सही ही कहा गया है -
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः  ॥

मैं अपने माता-पिता और सारे गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ और साथ ही विश्व के उन सारे गुरुओं को नमस्कार करता हूँ जिन्होंने किसी न किसी रूप में विश्व और लोक कल्याण के लिए अपना महती योगदान दिया है |

गुरु को समर्पित कुछ पंक्तियाँ मेरी तरफ से  :


हे गुरु !
ये जग तुम बिन अधूरा                                                  
दिया उजाला 
तूने
दूर किया 
तूने तिमिर अँधेरा
तेरी वजह से
है ये सुनहला धूप
और ये आशाओं भरा सवेरा


अदृश्य परंतु
समाहित
जिंदगी के पल पल में
चल अचल
मुश्किल सी हर डगर में
तुम हाथ थामे चलते
थके हुए प्राणों में
 नित्य नव ऊर्जा भरते

हे गुरु !
तुम शीतल जल की धारा
बहा ले जाते
हर संताप हमारा
तभी तो तुम
हमें सबसे प्यारा
तेरी चरणों में सदा
झुके शीश हमारा


हे गुरु !
ये जग तुम बिन अधूरा
दिया उजाला तुने
दूर किया तुने तिमिर अँधेरा
तेरी वजह से
है ये सुनहला धूप
और ये आशाओं भरा सवेरा


रविवार, 8 अप्रैल 2012

रिक्शावाला

 
     आज शर्मा जी फिर से ऑफिस जाने के लिए लेट हो रहे थे , और इसीलिए रिक्शेवाले को जल्दबाजी दिखाते हुए बोले " क्यों भई , कुछ खाया नहीं क्या .... थोड़ा जल्दी चलो ..... ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ ... "| रिक्शेवाले ने कुछ नहीं कहा , बस जैसे तैसे रिक्शे को खींचे जा रहा था | अभी १० ही बजे थे फिर भी हवा में गर्मी थी और ऊपर से सूरज की रौशनी भी तीखी हो चली थी , ऐसा लग रहा था मानो ये सब उसका इम्तिहान ले रहे हों | पर पता नहीं उसे इसका एहसास भी था या नहीं | बदन पर एक फटी सी गंजी और कमर पर आधी लिपटी गंदीली सी लूँगी | पसीने से भींगे उसके बदन को देखकर , उसकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था | पर शर्मा जी को ऑफिस जाने की जल्दी थी , सो उन्होंने रिक्शेवाले को थोड़ी तेज गति से रिक्शा चलाने को कहा | वैसे भी वो लगातार ३ दिन से ऑफिस के लिए लेट हो रहे थे और आज .... फिर से लेट नहीं होना चाहते थे | डाकखाने के पोस्टमास्टर ने उन्हें कल ही तो जमकर डाँट लगाई थी | डाँट भी अकेले में लगाते तो चलता , उन्होंने तो ऑफिस के कर्मचारियों के बीच उनकी जमकर ले ली थी .....| यही बात थी कि आज शर्मा जी फिर से लेट नहीं पहुँचना चाहते थे | मन ही मन बुदबुदाए जा रहे थे " कमबख्त ये रिक्शावाला भी ना .... मेरी तो किस्मत ही फूटी है .... आज तो यह मुझे फिर से लेट करवाएगा ...... कमबख्त , थोड़ा तेज चला लेगा तो इसके बाप का क्या चला जाएगा ! " वो अभी इसी सोच में थे कि पता नहीं क्यों रिक्शेवाले का नियंत्रण रिक्शे पे से खो गया और रिक्शा बगल के एक पेड़ से जा टकराया | रिक्शावाला जमीन पर गिरा , बेहोश पड़ा था और शर्मा जी स्तब्ध , आखिर ये सब एकाएक जो हुआ ... | उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि आखिर हुआ किया | लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी | लोगों की मदद से , पानी के कुछ छींटे उसके चेहरे पे डाले गए | वह उठा , फिर उसे पास के एक पेड़ के नीचे छाँव में बिठाया गया | कुछ देर तक शांत रहने के बाद शर्मा जी की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला "दो दिनों से कुछ ठीक से खाया नहीं साहब ...... बचिया भी बीमार है ..... दिन भर का सारा कमाया धमाया उसके ईलाज और दवा दारु में ही चला जाता है .....सही है कि भगवान भी आजकल अमीरों के लिए ही हैं , हम गरीबों के सब्र का तो वह बस इम्तिहान ही लेता रहता है ....", ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पे एक गहरा सवाल लिए उदासी छा गई थी, जिसका जवाब किसके पास था, पता नहीं | ना जाने फिर शर्मा जी को क्या हुआ , उन्होंने उस रिक्शेवाले को बगल के होटल में ले जाकर पहले तो भर पेट भोजन करवाया और फिर कुछ पैसे उसके हाथ में देते हुए बोले "रख लो इसे , जब कभी भी मन करे तो लौटा देना ..." | रिक्शे वाले ने बड़ी कृतज्ञ नज़रों से शर्मा जी की तरफ देखा | दोनों की नज़रों ने पल भर में एक दूसरे की आँखों में कुछ पढ़ लिया था ....| फिर शर्मा जी वहाँ से पोस्ट ऑफिस की ओर पैदल ही चल पड़े |
     आज फिर से लेट होने के कारण , पोस्टमास्टर ने उन्हें फिर से सुनाने शुरू कर दी , पर उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया, ..... शायद पोस्टमास्टर की बातें आज उनतक पहुँच नहीं रही थी | वो अपने टेबल के ओर बढे , कुर्सी पर बड़े इत्मीनान से बैठे, चश्मा उतारा, एक लम्बी साँस लेते हुए आँखें बंद की और फिर गर्दन कुर्सी पर पीछे की ओर झुकाया, थोड़ा आराम कि मुद्रा में ........ फिर हल्की सी मुस्कुराहट लिए किसी सोच में डूबते ही चले गए ........!!

रविवार, 1 अप्रैल 2012

आखिर बन ही गए ....

       (फोटो गूगल से साभार)



आज १ अप्रैल है और जेहन में कुछ यादें ऐसे ही ताजा हुए जा रहीं हैं |  सोचता हूँ कुछ लिख ही डालूँ , और जो बातें मुझे गुदगुदा रही हैं थोडा आपलोगों से भी शेयर कर लूँ |  "अप्रैल फूल".... इस दिन बहुत मजा किया करते थे हमसब | "हमसब" बोले तो मैं और मेरे मित्रगण |  कुछ मजेदार बातें हैं , शायद आपको भी अच्छा लगे | ये अलग बात है कि मैं अपनी मूर्खता का विवरण स्वयं अपने ही मुख से कर रहा हूँ | हाँ, तो मुझे बहुत ही शौक हुआ करता था Fool's  डे पर लोगों को मूर्ख बनाने में, या यूँ कहे कि उन्हें छकाने में |  वैसे तो छोटे मोटे तरीके से तो हम खूब मजा लिया करते थे लेकिन उनमें से एक ख़ास है जो मै आपलोगों को जरुर बताना चाहूँगा | मैंने अपने एक मित्र को कैसे छकाया वो बताता हूँ | मेरे मित्र के पास उस समय मोबाइल नहीं था (ये अलग बात है कि आज अधिकांश लोगों के पास आपको मोबाइल मिल ही जाएगी ) और अक्सर उसके घर से फ़ोन आया करता था, पास के ही एक बूथ पर | फिर बूथ वाला उसे बुलाकर लाया करता था और तब बात हुआ करती थी |  हमने १ अप्रैल को उस बूथ में बैठने वाले बच्चे को कुछ टॉफी दिया और फिर उसे बोला कि जाकर उसे बोले कि उसके घर से फोन आया है | उसने वैसा ही किया | बेचारा वो नींद में सोया हुआ था , दोपहर का समय था | नींद तोड़कर उठा और बूथ पर आ कर बैठ गया और फोन का इंतजार करने लगा | १०-१५ मिनट तक बैठने के पश्चात जब कोई फोन ( सो तो नहीं ही आना था ) नहीं आया तब हमलोग वहाँ पहुंचे ( मैं और मेरा एक अन्य मित्र ) |  उसकी नजर हमपर पड़ी, फिर हमलोग थोडा मुस्कुराए और तब उसे समझते देर नहीं लगी कि वह १ अप्रैल का शिकार बना है |  फिर १ अप्रैल को कोई Fool  बने तो वो  काफी खतरनाक हो जाता है | उसमें भी कहीं न कहीं बदले कि भावना तो जागृत हो ही जाती है | और यह तो सेकेण्ड टाईम था जब उसे हमलोगों ने उसे इस तरह से छकाया था | इस बार तो चैलेंज लगा था कि कोई Fool  बनाकर देख ले |  लास्ट टाईम तो इससे भी बुरा हुआ था | जनाब को अस्पताल के चक्कर कटवा दिए थे दिन भर ( ये भी एक बड़ा ही जबरदस्त वाकया है, १ अप्रैल का), सो इस बार तो वो सतर्क था | फिर भी बन ही गया | अब क्या करें, यही सोचते हुए थोडा मुस्कुराकर हमसब चले और जाकर उसके रूम पर बैठ गए | गप्पें मारने कि आदत थी , सो गप्पे चलने लगीं ... | इधर - उधर कि बातें होने लगी | लेकिन हम भी सतर्क थे कहीं हम भी मूर्ख न बन जाएँ | हमें तो पता था कि हम अलर्ट हैं इसलिए कोई कितना भी चाह ले , अब तो हम मूर्ख नहीं ही बन सकते |  कुछ देर बातें करने के बाद मेरा मित्र नीचे दूकान से कुछ नाश्ता लाने को गया | दूकान बस ५ मिनट की दूरी पर था | वह १०-१५ मिनट में आया |  साथ में कुछ बिस्किट्स और टोफियाँ थी और कुछ नमकीन | हमलोग खाए जा रहे थे और बातें किये जा रहे थे | एक टॉफी हमलोगों को काफी अच्छी लगती थी , वह सफ़ेद रंग का होता था | वह जब भी कुछ लाने जाता था तो वो टॉफी जरुर लाता था  | इसबार भी वह टॉफी वह  लाया था  | सो हमें इसका एहसास भी नहीं था कि अब हमलोग बहुत अच्छी तरीके से मूर्ख बनने जा रहे थे | क्या हुआ होगा, जरा सोचिये ...... शायद आप वो नहीं सोच सकते जो उसने सोचा था | हमलोगों ने जब वो टॉफी मुँह में रखी कि बस हो गया..... उसके आगे हम बिलकुल शांत हो कर एक-दूसरे कि ओर देखने लगे | मेरे दूसरे मित्र ने वह टॉफी पहले ही खा ली थी और अगर वो चाहता तो मुझे बता सकता था कि मत खा पछतायेगा, पर नहीं उसने सोचा कि जब मै मूर्ख बन ही चुका हूँ तो फिर और कोई क्यों बचे | यह तो मानवीय सोच है |  खैर रहने दीजिये, मुख्य बात पर आते हैं कि आखिर उस टॉफी में ऐसी ख़ास बात क्या थी कि हम मूर्ख बन गए | तो बात यह थी कि मेरे मित्र महोदय ने दूकान जाने के बहाने पहले तो सफ़ेद मोमबती खरीदी और एक दूसरी जगह जाकर उसे पीसकर उसको उस टॉफी के आकार में इस तरह से ढाला कि कोई भी नहीं पहचान सकता था कि यह सफ़ेद रंग वाली वही टॉफी नहीं है जो हम प्रायः खाया करते थे |  और यह सब इतनी तेजी से किया कि हमें जरा सा भी शक नहीं हुआ कि उसने ऐसा कुछ किया है |  तो फिर क्या था , मुँह में लेने के बाद , थोड़ी देर के लिए हमारा मुँह तो लटक गया लेकिन मेरे मित्र का चेहरा खिल गया | आखिर इतने जबरदस्त तरीके से बदला लिया था पूरे सूद सहित | बाद में हमने उसकी चतुराई और उसके प्रयास के लिए बुझे मन से बोला "मान गए भाई, हमने सोचा भी नहीं था इस बारे में, बाहर किसी को मत बताना, अपनी तो इज्जत ही चली जाएगी "। फिर थोड़ी देर बाद, हमसब रूम से निकल पड़े , अगले शिकार की तालाश में ....... ;)

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

लोरी

मुन्ने का माथा गोद में रखकर सहलाते हुए माँ लोरी गाए जा रही थी " चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा । सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा  ...." |  रात का समय और बिजली गुल थी ,  ऊपर से गर्मी |  लेकिन माँ की मीठी लोरी इन सब पर भाडी पड़ रही थी ,  मुन्ना बस सारे चीज भूलकर लोरी सुने जा रहा था  |  हवा भी शांत होकर मानो लोरी का आनंद ले रही हो | एक अजीब सी मिठास , प्यार और शुकून की अनुभूति के साथ वह आसमान को निहार रहा था |  बाल मन काफी निर्दोष होता है , मुन्ने ने बड़े प्यार से पूछा कि माँ ये तारे कहाँ से आते हैं , इतने सारे तारे .... (कहते हुए माँ की ओर देखने लगा ) | माँ ने माथा सहलाते हुए कहा "बेटा , हर किसी को एक दिन भगवान अपने पास बुलाते हैं और जो लोग भगवान के पास होते हैं वो तारे बनकर दूर से ही हमें देखते रहते हैं "
और ऐसा कहते हुए वह फिर से लोरी सुनाने लगी ....

"चंदा मामा दूर के
पूआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ने को दे प्याली में
प्याला गया फूट
मुन्ना गया रूठ  "

लोरी सुनते हुए ना जाने कब मुन्ने को नींद आ गई |

आज फिर से वह  उन तारों के निहार रहा था लेकिन ....... अकेला ...... | गर्मी से उसका हाल बुरा था |
उन तारों के बीच उसकी निगाह किसी को ढूँढ रही थी, शायद अपने  अतीत को, अपनी ......

मंगलवार, 14 जून 2011

गोरैया : एक संस्मरण

(फोटो गूगल से साभार)
बात उन दिनों की है जब मैं करीब १३ साल का होऊँगा । हमारे यहाँ घरों में अक्सर गोरैया (एक पक्षी) अपना घोंसला बना लेती है । मेरे घर में भी गोरैया का एक ऐसा ही घोंसला था । उसमे गोरैया का एक जोड़ा रहा करता था । उन्हें घोंसले में आते जाते देखना अच्छा लगता था । घोंसले में गोरैया का एक नवजात बच्चा भी था  । जब कभी गोरैया अपने बच्चे  के लिए बाहर से कड़ी मेहनत कर अनाज के कुछ दाने लाते थे  तब उनकी चहचहाहट से माहौल खुशनुमा हो जाया करता था । मैं और मेरा छोटा भाई दोनों अक्सर देखा करते थे इस दृश्य को । गोरैया के जोड़े अपने चोंच से दाना उठा उठाकर अपने बच्चे के मुँह में रखा करते थे । बहुत ही सुन्दर और आत्मीय दृश्य होता था वह । कुल मिलाकर एक छोटा मगर हँसता - खेलता परिवार था गोरैया का ।

पर कहते हैं न कि अनहोनी आपके आसपास हमेशा मंडराती रहती है । ऐसा ही कुछ हुआ उस गोरैया परिवार के साथ। बात यह थी कि जिस कमरे में उन्होंने अपना घोंसला बनाया था उसमें एक पंखा टंगा हुआ था । हालांकि हमलोग अक्सर इस बात का ध्यान रखा करते थे कि जब कभी वो कमरे में हों , पंखा बंद रहे । पर शायद होनी को कौन टाल सकता है । उस गोरैया माता-पिता में से एक उस पंखे कि चपेट में आ गया । और वहीं उसने अपने प्राण त्याग दिए, अपने पीछे एक छोटा सा संसार छोड़कर । हमने सुबह उसके निर्जीव शरीर को देखा और काफी दुखित हुए ।
उस घटना के बाद से हमलोग (मैं और मेरा छोटा भाई) तनहा अकेले बचे उस गोरैया और उसके बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान रखने लगे । हम भी उनके दुःख में शामिल थे पर ना तो हम उन्हें सांत्वना दे सकते थे और ना ही अपनी संवेदना उनके सामने प्रकट कर सकते थे । हमलोग अक्सर नीचे बिछावन पर बैठकर उनके घोंसले की ओर देखा करते थे , जहाँ से वो गोरैया भी हमें देखा करती थी , आँखों में एक सवाल लिए जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं था ।

कुछ दिन इसी तरह बीतता गया । पर एक दिन ना जाने क्या हुआ , गोरैया कमरे में नहीं आई । गोरैया के उस नवजात बच्चे की तरह , हमलोग भी उसके आने का इन्तजार कर रहे थे । रात बीत गया .... सुबह हो गई ... पर वो नहीं आई । बच्चा भूख से छटपटा रहा  था जो कि उसके करुण आवाज़ में सहज ही प्रकट होता था । उसकी इस छटपटाहट के साथ हमारे मन में भी आशंकाओं की सुनामी उठने लगी थी । हमलोग इस सोच में पड़े थे कि आखिर क्या हुआ जो वह नहीं आई । हमसे उसकी भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी ।

हमलोगों ने शाम तक गोरैया का इन्तजार किया पर वह नहीं आई । अंततः हमदोनों ने गोरैया के बच्चे को खुद से ही दाना खिलाने की सोची । हमने घर में बने चावल के कुछ दाने लिए और उनके घोंसले में रख दिया , एक छोटी सी कटोरी में रखकर । कुछ देर बाद जब हमने मुआयना किया तो देखा कि सारे चावल के दाने ज्यों के त्यों पड़े थे। हम बहुत उदास हुए । हमें ऐसा लगा के शायद वो हमारे हाथ का दिया दाना नहीं खाना चाहते थे । फिर हमें ध्यान आया कि अभी तो वह नवजात है और खुद  दाना नहीं चुग सकता है । तभी तो उसके माता-पिता अपनी चोंच से दाना उसके मुँह में डालते थे । तब हमने अपने हाथों से एक एक दाना लेकर उनके मुँह में डालना शुरू किया । और वह उसे सप्रेम स्वीकार करता गया । आखिर उसे भूख भी तो लगी थी .... । उसके कोमल चोंच जब हमारे हाथों कि उँगलियों को स्पर्श करते थे तो एक सुखद आनंद की अनुभूति होती थी । कुछ ही दिनों में हमारा उसका संबंध बहुत आत्मीय हो गया था । हमें ऐसा लगता था कि हमने भाषायी सीमाओं को तोड़ दिया है और मनुष्य एवं पक्षी के बीच की खाई को भी पाट दिया है । उसकी आँखें हमारे लिए भाषा और अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई थीं । उसकी चहचहाहट काफी कुछ बयां कर देती थी | तब समझ में आया की संबंधों में भाषायी विविधता कोई बड़ी समस्या नहीं है , बस आत्मीयता होनी चाहिए , प्रेम होना चाहिए । पर आज मनुष्यों के बीच शायद इसका अभाव है ।


(फोटो गूगल से साभार)
इसी तरह दिन बीतता गया । हम उन्हें रोज दाना खिलाया करते थे , अपने हाथों से ।  हमें एक डर भी था कि कहीं वह गलती से ऊपर बने उस घोंसले से नीचे ना गिर जाए । हालाँकि ऐसी संभावना कम ही थी लेकिन फिर भी हमने खुद से उसके  लिए एक अलग घोंसला बनाया, घास-फूस और पत्तों से पूरी तरह से सुरक्षित । हमने घोंसले को एक चारों तरफ से बंद तथा ऊपर से खुले काठ के एक बक्से में रखकर उसमें उन बच्चों को रख दिया । अब वह सुरक्षित था  और हम निश्चिन्त .... । हम निश्चिन्त थे कि अब वो गिर नहीं सकता था ।  अब तो वो जब भी हमें देखता था बस चहकना शुरू कर देता था । फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे देखकर हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । हुआ यह कि वह घोंसले से बाहर निकलकर कमरे में इधर - उधर फुदक रहा था । वह उड़ने की कोशिश कर रहा था । हमने भी उसके उड़ान भरने के प्रयास में अपने स्तर से सहयोग किया । हालांकि अभी वह छोटी - छोटी उड़ाने ही भरता था पर वह हमारे लिए सुकुनकारक एवं आनंदकारी था , आखिर उसने उड़ने की कोशिश जो शुरू कर दी थी । हम काफी खुश थे .... ।

फिर एक दिन आया जब उसने लम्बी उड़ान भरी और उड़कर हमारे घर के बाहर एक आम की डाली पर जा बैठा । बहुत अच्छा लग रहा था .... । खुशी हुई पर एक दुःख भी था मन में कि आज वह हमें छोड़कर अपनी दुनिया में जा रहा था । तब उसकी आँखों में दूर से ही देखा था  हमने , हमारे लिए आत्मीय प्रेम को .......... और एक वादा ........ फिर से मिलने का ....... ।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया

शीर्षक :  आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया

लोकल ट्रेन अपनी धुन में चली जा रही थी |  अपनी सीट पर बैठे हिमेश कुछ सोच रहा था |  उसके हाथ में एक लेटर था जिसे वह कभी - कभी खोल कर पढ़ लेता था और फिर कुछ सोचने लगता था |  आज उसकी नजरें भी ट्रेन पे चिपके उस पोस्टर पर जा जा कर ठहर जाती थी जिसपे लिखा था  "घर बैठे कमाइए १२ से १५ हजार " (ऐसे पोस्टर आपको मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में बहुत जगह मिल जाएँगे) |  रोज की तरह वह ट्रेन से उतरा और रूम के लिए चल पडा |
हिमेश रूम पे पहुँचा तब उसके हाथ में लेटर देखकर अमरीश पूछ बैठा  " ये तेरे हाथ में क्या है !" 
हिमेश ने बड़ी शांति से कहा  "वही लव लेटर है , ऑफिस की तरफ से  "  
"लव लेटर ! वो भी ऑफिस की तरफ से |  मजाक मत कर ला दिखा क्या है "
"हाँ, हाँ देख ले , तुझे भी ये मिल ही जाएगी १-२ दिन में " ऐसा कहते हुए हिमेश  ने लेटर उसके हाथ में थमा दिया |
(वस्तुतः हिमेश और अमरीश एक ही ऑफिस के दो अलग अलग ब्रांचों में काम करते हैं , और दोनों एक साथ ऑफिस के दिए बैचलर्स रूम में रहते हैं |)

लेटर पढ़कर अमरीश भी थोड़ी देर के लिए शांत हो गया | 
"ऐसा कैसे होगा , एक तो हमारी सैलरी कम है , ऊपर से ये इतना पैसा रूम के किराए के तौर पे काट लेंगे , तो फिर हमारे पास बचेगा क्या !"
(वस्तुतः उस लेटर में किराए बढ़ने की बात थी , पहले उन्हें काफी कम किराया देना पड़ता था , सो वो बड़े आराम से मस्ती में रह रहे थे, हालांकि उनकी सैलरी कम थी पर किराया कम कटने की वजह से उन्हें प्रॉब्लम नहीं होती थी  )
"यार , हम ये रूम छोड़ देते हैं और कहीं और देखते हैं "
"तेरे पास डिपोजिट के पैसे हैं , रूम छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं है पर नए रूम के लिए डिपोजिट भी तो भरना पड़ेगा ! " (हिमेश ने कहा )
(मुंबई जैसे शहर में आपको किराए के रूम में रहने के लिए पहले अच्छी खासी रकम डिपोजिट के तौर पे जमा करनी होती  है )
दोनों इस मुद्दे पर सोच विचार कर रहे थे की आखिर वो क्या करें .....
हिमेश ने कहा " मैंने , कुछ नंबर (मोबाइल के ) नोट किये हैं , पार्ट टाइम जॉब के लिए |  मैं सोचता हूँ बात करनी चाहिए "
अमरीश ने उसकी तरफ देखा "ये सब भी सही नहीं होते हैं, ऐसे ही बोलते कुछ हैं , करवाते कुछ और हैं |  तुम जैसा सोच रहे हो उतना आसन नहीं है पार्ट टाइम जॉब करना "
हिमेश ने कहा "तो फिर क्या करें "
"कुछ नहीं चल बैठकर टीवी देखते हैं , टेंशन लेने से कुछ नहीं होने वाला |  वैसे भी कहते हैं न की 'चिंता चिता के सामान है ' "
दोनों टीवी देखने बैठ गए |  टीवी पर गाना आ रहा था....

"एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में
आबोदाना ढूँढता है , आशियाना ढूँढता है  ................"

दोनों बस शांत बैठे गाने का आनंद ले रहे थे, बिना किसी टेंशन के  ................... !!



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