रविवार, 8 अप्रैल 2012

रिक्शावाला

 
     आज शर्मा जी फिर से ऑफिस जाने के लिए लेट हो रहे थे , और इसीलिए रिक्शेवाले को जल्दबाजी दिखाते हुए बोले " क्यों भई , कुछ खाया नहीं क्या .... थोड़ा जल्दी चलो ..... ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ ... "| रिक्शेवाले ने कुछ नहीं कहा , बस जैसे तैसे रिक्शे को खींचे जा रहा था | अभी १० ही बजे थे फिर भी हवा में गर्मी थी और ऊपर से सूरज की रौशनी भी तीखी हो चली थी , ऐसा लग रहा था मानो ये सब उसका इम्तिहान ले रहे हों | पर पता नहीं उसे इसका एहसास भी था या नहीं | बदन पर एक फटी सी गंजी और कमर पर आधी लिपटी गंदीली सी लूँगी | पसीने से भींगे उसके बदन को देखकर , उसकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था | पर शर्मा जी को ऑफिस जाने की जल्दी थी , सो उन्होंने रिक्शेवाले को थोड़ी तेज गति से रिक्शा चलाने को कहा | वैसे भी वो लगातार ३ दिन से ऑफिस के लिए लेट हो रहे थे और आज .... फिर से लेट नहीं होना चाहते थे | डाकखाने के पोस्टमास्टर ने उन्हें कल ही तो जमकर डाँट लगाई थी | डाँट भी अकेले में लगाते तो चलता , उन्होंने तो ऑफिस के कर्मचारियों के बीच उनकी जमकर ले ली थी .....| यही बात थी कि आज शर्मा जी फिर से लेट नहीं पहुँचना चाहते थे | मन ही मन बुदबुदाए जा रहे थे " कमबख्त ये रिक्शावाला भी ना .... मेरी तो किस्मत ही फूटी है .... आज तो यह मुझे फिर से लेट करवाएगा ...... कमबख्त , थोड़ा तेज चला लेगा तो इसके बाप का क्या चला जाएगा ! " वो अभी इसी सोच में थे कि पता नहीं क्यों रिक्शेवाले का नियंत्रण रिक्शे पे से खो गया और रिक्शा बगल के एक पेड़ से जा टकराया | रिक्शावाला जमीन पर गिरा , बेहोश पड़ा था और शर्मा जी स्तब्ध , आखिर ये सब एकाएक जो हुआ ... | उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि आखिर हुआ किया | लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी | लोगों की मदद से , पानी के कुछ छींटे उसके चेहरे पे डाले गए | वह उठा , फिर उसे पास के एक पेड़ के नीचे छाँव में बिठाया गया | कुछ देर तक शांत रहने के बाद शर्मा जी की तरफ मुखातिब होता हुआ बोला "दो दिनों से कुछ ठीक से खाया नहीं साहब ...... बचिया भी बीमार है ..... दिन भर का सारा कमाया धमाया उसके ईलाज और दवा दारु में ही चला जाता है .....सही है कि भगवान भी आजकल अमीरों के लिए ही हैं , हम गरीबों के सब्र का तो वह बस इम्तिहान ही लेता रहता है ....", ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पे एक गहरा सवाल लिए उदासी छा गई थी, जिसका जवाब किसके पास था, पता नहीं | ना जाने फिर शर्मा जी को क्या हुआ , उन्होंने उस रिक्शेवाले को बगल के होटल में ले जाकर पहले तो भर पेट भोजन करवाया और फिर कुछ पैसे उसके हाथ में देते हुए बोले "रख लो इसे , जब कभी भी मन करे तो लौटा देना ..." | रिक्शे वाले ने बड़ी कृतज्ञ नज़रों से शर्मा जी की तरफ देखा | दोनों की नज़रों ने पल भर में एक दूसरे की आँखों में कुछ पढ़ लिया था ....| फिर शर्मा जी वहाँ से पोस्ट ऑफिस की ओर पैदल ही चल पड़े |
     आज फिर से लेट होने के कारण , पोस्टमास्टर ने उन्हें फिर से सुनाने शुरू कर दी , पर उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया, ..... शायद पोस्टमास्टर की बातें आज उनतक पहुँच नहीं रही थी | वो अपने टेबल के ओर बढे , कुर्सी पर बड़े इत्मीनान से बैठे, चश्मा उतारा, एक लम्बी साँस लेते हुए आँखें बंद की और फिर गर्दन कुर्सी पर पीछे की ओर झुकाया, थोड़ा आराम कि मुद्रा में ........ फिर हल्की सी मुस्कुराहट लिए किसी सोच में डूबते ही चले गए ........!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. कथा लघु है पर उसका प्रभाव विशाल है ||

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  2. @मनोज सर : टिप्पणी देने के लिए धन्यवाद :)

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  3. मजा आ गया यार, अपने ब्लॉग को "अपना ब्लॉग" में सम्मिलित करो अगर ज्यादा पढ़वाना चाहते हो तो

    ऑर दूसरों के ब्लॉग पढ़ने हो तो भी अपना ब्लॉग पर आओ पता है

    अपना ब्लॉग, हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर

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  4. अच्छी कथा है \ दिल को छु लेने वाली

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