शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

निमिया के डाढ़ी मैया

(फोटो गूगल से साभार)


निमिया के डाढ़ी मैया एक प्रचलित माता गीत है बिहार, उत्तरप्रदेश आदि क्षेत्रों में।  इस गीत का लिरिक्स (बोल)  ढूंढ रहा था इंटरनेट पे हिंदी में, मुझे नहीं मिला।  फिर मैंने गाना सुनकर उसका लिरिक्स खुद से लिखा है।  मुझे यह गीत बहुत ही पसंद है। यहाँ साझा कर रहा हूँ शायद कोई सज्जन लिरिक्स (बोल) ढूंढे तो उसे यह मिल जाए। अगर कुछ त्रुटि हो तो कृपया टिपण्णी (कमेंट) करके मुझे जरूर बताएँ मैं उसमें सुधार करूँगा। 

|| जय माता दी ||  

निमिया के डाढ़ी मैया - २ 
डाले ली असनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 

सातो रे बहिनिया के भैरों हवें भैया 
आदि शक्ति देवी के अनेक बाटे नैया - २ 
जेकरा सहारा नईखे - २ 
राखे लीं शरणवा
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं वरदनवा 
कि झूमी झूमी ना  
मैया दे लीं वरदनवा 
कि झूमी झूमी ना  

कामरुख कमख्या कलकत्ता वाली काली 
मैहर में शारदा विंधाचल विंध वाली - २ 
काश्मीर में वैष्णो देवी - २ 
जाने ला जहनवा 
कि झूमी झूमी ना   
भक्त करे दर्शनवा 
कि झूमी झूमी ना 
भक्त करे दर्शनवा 
कि झूमी झूमी ना 

आरा ऐरन देवी विन्धा में महथिन दाई 
शीतला बनारस बाड़ी अन्नपूर्णा माई - २ 
बाड़ा भीड़ होला ओहि जा 
बाड़ा भीड़ होला धनतेरस के बिहनवा  
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं अन्न धनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया दे लीं अन्न धनवा 
कि झूमी झूमी ना 

गजरा पछिन मष्तिका है मुर तारा रानी 
बारी उजियार धत मंगला भवानी - २ 
गहमर सकरा गढ़ में - २  
कमख्या   स्थनवा  
कि झूमी झूमी ना 
करे ला छाऊ बाबा पूजनवा 
कि झूमी झूमी ना 

भलनि भवानी पटन देवी थावे वाली 
बाड़ी डुमराव  डुमरेदिनी अउरी काली  - २ 
सावन सप्तमी के चढ़े - २ 
पुआ पकवनवा 
कि झूमी झूमी ना 
भरत गावे ले भजनवा 
कि झूमी झूमी ना 


निमिया के डाढ़ी मैया - २ 
डाली ली असनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 
मैया झूले लीं झुलनवा 
कि झूमी झूमी ना 



इस गीत का वीडियो लिंक : https://www.youtube.com/watch?time_continue=435&v=pqDJcIw3Qlw
(आप भी सुनेें, बहुत ही सुंदर गीत है। )




बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

खुली किताब



(फोटो गूगल से साभार)


मैं एक खुली किताब
जिसने भी मुझे पढ़ा
मुझे भिगोता गया 
अपने आँसूओं से 

जिस वजह से 
मेरे शब्द 
धुंधले हो गए हैं 
मुझे पढ़ने में अब
लोगों को बड़ी मुश्किलें होती है 
शब्द , स्पष्ट नहीं दिखते
और कहीं कहीं तो 
पूरा का पूरा 
पृष्ठ ही धुंधला है

मुझे  पढ़ने वाले
अब समझ नहीं पाते मुझे
अनुमान से शब्द अधूरे, पूरे करते हैं 
पर वो शब्द 'अधूरा' ही रह जाता है
और शायद 'सत्य' भी 

कभी कभी 
खुली किताब होना भी
अस्तित्व के लिए 
खतरा बन जाता है
जाने अनजाने में ही
बहुत कुछ मिट जाता है 
बड़ा ही पीड़ादायक होता है फिर
खुद को संभालना 
मैं और क्या कहूँ तुमसे
तुम मुझे ही देख लो !




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