शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

'वो' गीत

(फोटो गूगल से साभार)
पीर की गहराई में
दिल की तन्हाई में
ढूँढते खुद को
खुद की परछाई में
'वो' कुछ बोल पड़ा है
हाँ, 'वो' जो सोया पड़ा था
कई दिनों से
आज तोड़ मौन
बस रो पड़ा है

मन का आकाश
बादलों से घिरा
शाम पिघल कर आज
दामन में जो गिरा
'दिये' ने रौशनी फैलाई है
गुजरता कारवां सामने
'वो' कुछ इस तरह
आँखों
में बरस आई  है

करवटे बदलती राहों से
स्याह रात की दीवारों से
निकल कर 'चाँद'
आँगन में बिखरा है
शब्द मूक बह रहे
बह रहा 'वो' गीत
और गीत का टुकड़ा है

हाँ, 'वो' जो सोया पड़ा था
कई दिनों से
आज तोड़ मौन
बस रो पड़ा है


http://shivnathkumar.jagranjunction.com/

8 टिप्‍पणियां:

  1. हमको भी रुलायेंगें क्या, दिल के अंदर तक दस्तक देती आपकी ये बोली!

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  2. बहुत संवेदनशील रचना निशब्द कर दिया आपने आपकी सोंच और लेखनी को नमन

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  3. अंतर्मन से लिखी संवेदनशील रचना ... लाजवाब ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. धन्यवाद सुनील जी,,,, आपकी उत्साहवर्धक टिपण्णी के लिए !!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. करवटे बदलती राहों से
    स्याह रात की दीवारों से
    निकल कर 'चाँद'
    आँगन में बिखरा है
    शब्द मूक बह रहे
    बह रहा 'वो' गीत
    और गीत का टुकड़ा है

    आग लगा दी शिवनाथ जी ,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  6. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  7. हाँ, 'वो' जो सोया पड़ा था
    कई दिनों से
    आज तोड़ मौन
    बस रो पड़ा है
    बहुत खूब लिखा है । मनुष्य की कुछ अनछुई अनकही भावनाओ को आपने जिस तरह शब्दों मई पिरोया है काबिले तारीफ है ।

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