मैं कब मांगता हूँ
पूरा आकाश
बस मांगता हूँ
थोड़ी सी जमीन
जमीन जहाँ
मैं थोड़ी खुशियों की
खेती कर सकूँ
जहाँ रात को
चाँद की थोड़ी रौशनी
समेट सकूँ
और उस रौशनी में नहाता हो
एक छोटा सा घर
जो ईंट पत्थरों से नहीं
मिट्टी और खर से बना हो
जहाँ केवल सोंधी मिटटी की खुशबू
घुली हो हवाओं में
और उन हवाओं में मैं
शुकून की थोड़ी
ठंढी सांस ले सकूँ
जहाँ कुछ भी
कृत्रिम ना हो
बनावटी ना हो
हर चीज प्रकृति के निकट
इस कृत्रिमता और बनावटीपन ने
उलझा रखा है मुझे
कैद कर लिया है कहीं मुझे
मेरे ही अन्दर
कब मुक्त होऊंगा मैं
और कब मिलेगी मुझे
मेरे सपनों की
वह जमीन
क्या वह जमीन बस एक स्वप्न भर है ?
क्या वह जमीन मुमकिन है ?
बिन जमीन
भौतिकताओं में बंधा
प्रश्न अब भी खड़ा
अनुत्तरित
अनुत्तरित
स्वप्न और हकीकत के बीच
@फोटो : गूगल से साभार
क्या बात है शिवराज जी! आपने तो दिल जीत लिया । वो चाँदनी मे नहाती कुटियों वाली जमीन कहीं मिल जाए तो मुझे भी बताना - मैं आपका पड़ोसी बनना चाहूँगा ।
जवाब देंहटाएंचांद में नहाया घर.....काश मिल पाता आपको हम सबको कृत्रिमता के बिना।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
बहुत ही सुंदर और सशक्त रचना.
जवाब देंहटाएंरामराम.
ये भी जीवन का द्वंद्व है .... बहुत बढ़िया रचना
जवाब देंहटाएंकोमल भाव लिए सुन्दर रचना...
जवाब देंहटाएं:-)
भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....
जवाब देंहटाएंआकाश तो वैसे भी संभव नहीं होता छोटी जमीन पाए बिना ... उससे ही सिमिट के अपना आकाश बनता है ... हकीकत के घर की चाह तो सभी को है ...
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर और कोमल भाव लिए खुबसूरत रचना..
जवाब देंहटाएंन अरमान खुशियों के
जवाब देंहटाएंन चाहत बुलंदी की
अदद सी ज़िन्दगी दे दे
हो ज़रा सी शान्ति जिसमे ..
भावपूर्ण रचना हेतु बधाई।
कृपया यहाँ भी पधारें http://www.manovriti.blogspot.in/
क्या वह जमीन बस एक स्वप्न भर है ?
जवाब देंहटाएंक्या वह जमीन मुमकिन है ?
क्यों मुमकिन नहीं है ? नामुमकिन को मुमकिन बनाने के
लिए थोडा ज्यादा प्रयत्न की जरुरत होती है !
बहुत सुन्दर भाव है रचना में, साकार हो यही
शुभकामनायें !
http://kuchmerinazarse.blogspot.in/2013/08/7.html
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर भावपूर्ण और प्रभावी अभिव्यक्ति...
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