बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ये बिंदिया



(फोटो गूगल से साभार) 




तुम्हारी आँखों में 
सवाल हजार हैं
तुम्हारे माथे की बिंदिया 
उनके जवाब हैं 

तुम बोलो ना बोलो 
ये बिंदिया बोल देती है 
तुम्हारे सारे जज्बात 
यूँ ही खोल देती है 

तुम्हारे रंज 
गिले शिकवे 
सब चुपचाप सुनती है 
तुम्हारी बिंदिया ही तो है 
जो माथे की गहन
रेखाओं के बीच 
खुशियाँ ढूँढ लेती है 

यही बिंदिया है 
जो कर जाती है
हर शाम पूनम 
भर रही होती जो उजाला 
मन में, जिंदगी में 
धीरे धीरे 
मद्धम मद्धम 





10 टिप्‍पणियां:

  1. बिंदिया जब माथे पे खिलती है तो पावन होकर सब कुछ कह देती है ...
    इस बिंदिया के माध्यम से आपभी बहुत कुछ कह गए ...

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  2. निशब्द कर दिया शिवनाथ जी
    दिल की गहराईयों से बनी कविता .....छू गई इस मन को ....आभार

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  3. तुम्हारे रंज
    गिले शिकवे
    सब चुपचाप सुनती है......

    उत्तर देंहटाएं
  4. अँधेरे में भटक जाता हूँ लगती है शीतल चँन्दा सी तुम्हारी बिंदियाँ
    http://savanxxx.blogspot.in

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  5. आपको सपरिवार होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपको भी सपरिवार होली की बधाई व शुभकामनाएँ !! :) :)

      हटाएं
  6. बहुत ही सुंदर कविता। आपको होली की ढेरों बधाइयां। इस लिंक पर मेरी नई पोस्‍ट मौजूद है।

    उत्तर देंहटाएं
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