शुक्रवार, 15 मई 2015

झुकी पलकें


(फोटो गूगल से साभार)


झुकी पलकें 
बड़ी ख़ामोशी से 
लम्हा लम्हा 
सहेज रही है 

ओस की एक बूंद 
आ टिकी है पलकों के कोर पर 
और शबनमी हो गयी आँखे 
बस बंद ही रहना चाहती हैं 

रात शतरंज की बिसात बिछाए 
बैठा है 
शह और मात के बीच 

अभी अभी खामोशी टूटी है 
कुछ गिरा है 
जमीं पर आकर 

जो देखा तो 
चाँद बिखरा पड़ा है 
टुकड़ों में 
और पलकें 
अभी भी 
झुकी हैं 
समेटे कुछ ख्वाब 
अपनी परछाईयों में 




8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-05-2015) को "झुकी पलकें...हिन्दी-चीनी भाई-भाई" {चर्चा अंक - 1977} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

    उत्तर देंहटाएं
  2. समेटे ख्वाब---
    अपनी परछाइयों में
    बहुत खूबसूरत.

    उत्तर देंहटाएं
  3. इन ख़्वाबों को यूँ ही सजे रहने देना ... तोड़ देता है ज़माना बेरहमी से ...
    भावपूर्ण रचना है ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावपूर्ण एव हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति।मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अभी अभी खामोशी टूटी है
    कुछ गिरा है
    जमीं पर आकर

    बहुत सुंदर तरीके से उतरा ना ...अब कुछ बाकी न बचे कहने के लिए ...अंतिम पंक्तियाँ सब कुछ कह जाती है ...आपका आभार

    उत्तर देंहटाएं

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