शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

भीगा एक चाँद

(फोटो गूगल से साभार)
 
 
 
भीगा एक चाँद, डूबा हुआ ताल में  
उसे निकाल लिया 
और फिर सुबह की धूप में 
संग उसे बिठा लिया 

ठंढी धूप बह चली 
महक उठी हर गली 
बदला हर नजारा है 
खिल उठी मुरझाई कली 

भीगा चाँद 
हर किसी को कहाँ नसीब होता है 
भीगी मुस्कराहट लिए 
हर कोई बस कहीं भीग रहा होता है 

मेरी खुशनसीबी है 
भीगा चाँद आज मेरे पास है 
मैं अपनी फकीरी पर क्यूँ रोऊँ 
कुछ नहीं, पर सबकुछ मेरे पास है 

रात तकिये के सिराहने 
रख चाँद मैं सो गया 
जो उठा, तो मिला एक आसमां 
और भोर हो गया 



बुधवार, 28 अगस्त 2013

कहाँ गई उस तरु की हरियाली






कुछ दिन पहले झूम रहा था
जाने क्या हुआ अब उसको
उसके मन की करुण दशा
भला बताए जाकर किसको
सूखे मुरझाए हैं पत्ते, सूखी हर डाली डाली
कहाँ गई उस तरु की हरियाली


गर्मी के गरम थपेड़े
कितनी बार उसने है झेले
सर्दी की ठंढ हवाएँ
झेला हंसकर दृढ अकेले
पर अम्बर में है अब, जब छाई बदरी काली
कहाँ गई उस तरु की हरियाली


उत्सव मना रहा हर कोई
फिर क्यूँ वह शांत पड़ा है
ना जाने किस दर्द की पीड़ा
मूक हुआ वह ठूंठ खड़ा है
कारण उदासी का उसकी , नहीं जानता उसका माली
कहाँ गई उस तरु की हरियाली


देखकर उसकी वेदना
क्या दुखी है कोई और
संग नहीं अभी कोई उसके
यह जीवन का कैसा दौर   
पूछ रहा यह प्रश्न खुद ही से, खुद व्यथित तरु की डाली 
कहाँ गई उस तरु की हरियाली 




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