गुरुवार, 4 सितंबर 2014

आखिर कौन था वो ?



(फोटो गूगल से साभार)



कभी कभी ठहर जाता हूँ 
आईने के सामने आकर 
मेरा प्रतिबिंब नहीं दिखता 
दिखता है कुछ और

तीन खीचीं लकीरें 
मेरे माथे पर 
और आँखों के नीचे 
सूनापन लिए गहरा अन्धकार 
कुछ और ही 
बोल रहा होता है 

इतना उदास सा चेहरा 
कब हुआ ऐसा !
पता नहीं चला 
और क्यूँ !
यह भी अज्ञात 

फिर आभास होता है मुझे  
कोई पीछे खड़ा है मेरे 
मुस्कुराता हुआ 
मेरे ऊपर  
(शायद 'मैं' ही हूँ )
मैं मिलता हूँ उससे 
और अब 
आइने में 'मैं' हूँ 
कोई और नहीं
.
.
आखिर कौन था वो ?


5 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार खुद को पहचानना जब मुश्किल हो जाता है तब आइना राह दिखाता है ...
    खुद के कई रूप छुपे रहते हैं अपने अन्दर ...

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  2. मेरा प्रतिबिंम्ब नहीं दिखता शायद यह पंक्ति ठीक रहेगी !

    उत्तर देंहटाएं

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