गुरुवार, 7 नवंबर 2013

शोर जो उगे हैं कुछ उन्हें निकाल रहा हूँ

(फोटो गूगल से साभार)


हल गाड़ दिया जमीन में
कुछ संकल्प उठा रहा हूँ 
शोर जो उगे हैं कुछ
उन्हें निकाल रहा हूँ
जो आतंकित करते हैं
खा जाते हैं
शुकून के फसल को
उन्हें जलाने की
तैयारी किए जा रहा हूँ

जख्म पर नमक
क्यूँ छिड़कते हैं लोग
नफरत का खेल कैसा
आज खेलते हैं लोग
जो ठान लिया है
मरहम लगाने कि
मरहम लगा रहा हूँ
नफरत का एक पेड़ काटा है अभी
प्रेम का पौधा इक लगा रहा हूँ

शोर जो उगे हैं कुछ
उन्हें निकाल रहा हूँ

कतरा कतरा पसीने का
बहुत है कीमती 
मगर हवा कुछ बदली है ऐसी 
अब यह मोती
देखने को नहीं मिलती
जो हवाओं की कब मानी है
आज कहीं बैठा
बस पसीना बहा रहा हूँ

शोर जो उगे हैं कुछ
उन्हें निकाल रहा हूँ





16 टिप्‍पणियां:

  1. चलो उखाड़ फेकते हैं शोर की खरपतवार......
    प्रेम और सुकून उगाते हैं..
    बहुत सुन्दर!!!
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया
    आदरणीय शिवनाथ जी-
    आभार-

    उत्तर देंहटाएं
  3. जख्म पर नमक
    क्यूँ छिड़कते हैं लोग
    नफरत का खेल कैसा
    आज खेलते हैं लोग
    जो ठान लिया है
    मरहम लगाने कि
    मरहम लगा रहा हूँ
    नफरत का एक पेड़ काटा है अभी
    प्रेम का पौधा इक लगा रहा हूँ
    shayad is tarah hi desh se nafrat kam ho paye.bahut sundar prastuti .

    उत्तर देंहटाएं
  4. जख्म पर नमक
    क्यूँ छिड़कते हैं लोग
    नफरत का खेल कैसा
    आज खेलते हैं लोग
    जो ठान लिया है
    मरहम लगाने कि
    मरहम लगा रहा हूँ
    नफरत का एक पेड़ काटा है अभी
    प्रेम का पौधा इक लगा रहा हूँ
    shayad is tarah hi desh se nafrat kam ho paye .nice expression .

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रेम उगाओ
    प्रेम फैलाओ..
    निकाल फेंको
    शोर के खरपतवार.....
    बेहतरीन रचना...
    :-)

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  6. नफरत का एक पेड़ काटा है अभी
    प्रेम का पौधा इक लगा रहा हूँ
    Bahut sunder, sakaratmak kawita. yahee jajba bana rahe. Mere blog par aap aaye bahut abhar .Sneh banaye rakhen.

    उत्तर देंहटाएं
  7. नफरत का एक पेड़ काटा है अभी
    प्रेम का पौधा इक लगा रहा हूँ
    बहुत कुछ सार्थक बाते है रचना में, बहुत सुन्दर लगे !
    जो हम बोते है वही तो पाते है, नफरत करना बहुत आसान काम है कोई भी कर लेता है
    लेकिन प्रेम अत्यंत कठिन कोई विशेष ही कर पाते है , इस पौधे पर फूल जरुर लगते है पर देर से,यही जज्बा कायम रहे !

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  8. अति सार्थक। सुन्‍दर जीवंत कविता।

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  9. आतंकित करने वाले काँटों को बाहर निकाल फैंकना ही ठीक है ... तभी संकल्प पनप पाएंगे ...
    संवेदनशील भाव लिए ...

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  10. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  11. आज कहीं बैठा
    बस पसीना बहा रहा हूँ

    शोर जो उगे हैं कुछ
    उन्हें निकाल रहा हूँ
    ...............उखाड़ फेकते हैं शोर की खरपतवार

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  12. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  13. "जो हवाओं की कब मानी है
    आज कहीं बैठा
    बस पसीना बहा रहा हूँ "
    बेहतरीन..........

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  14. प्रिय ब्लागर
    आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

    welcome to Hindi blog reader

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  15. बहुत सार्थक सुन्‍दर जीवंत कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

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