रविवार, 7 जुलाई 2013

धूप और छाँव







जो चुनना हो 
धूप और छाँव में 
चुनूँगा धूप 
क्यूँकी छाँव ....
छाँव तो मिथ्या है 
बहरुपी है


मगर धूप 
धूप का रूप नहीं 
अरूप है 
सत्य है धूप का अस्तित्व 
वह रूप नहीं बदलती


धूप जीवन 
भरती है 
पेड़ों में 
पौधों में 
फसलों में
धरा का कण कण 
होता पोषित 
धूप से 


जिसने धूप स्वीकारा 
फला फूला
और जो बैठा रहा 
छाँव तले  
उसे क्या मिला ! 
  

सच कहूँ तो 
धूप उतनी ही सच्ची है 
जितना संघर्ष 
और छाँव उतनी ही मिथ्या 
जितना सुख 




@फोटो:  गूगल से साभार 
 

21 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक व् सार्थक अभिव्यक्ति .आभार

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  2. सच.............
    धुप चुनें तो छाँव खुद-ब-ख़ुद पास चली आती है...
    बहुत गहन भाव..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. धूप जरुरी है जीवन के लिए , छाँव खिंची चली आती है इसके पीछे !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहूँ तो
    धूप उतना ही सच्चा है
    जितना संघर्ष
    और छाँव उतना ही मिथ्या
    जितना सुख
    ek bahut bada sach!!! bahut sunder likha hai

    उत्तर देंहटाएं
  5. सही है, धूप ही परिश्रम का पर्याय है, बहुत ही सुंदर.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  6. गहन भाव लिए सुन्दर रचना..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. धूप जीवन
    भरता है
    पेड़ों में
    पौधों में
    फसलों में
    धरा का कण कण
    होता पोषित
    धूप से ...............गहरे व सच्‍चे भावार्थ से अलंकृत सुन्‍दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  8. मिथ्या तो ये भी है की अंधेरा सूरज को लील लेता है या प्रकाश अंधेरे को चीर देता है ...
    विषय सोचने का है ... पर प्रकाश जीवन ले के आता है प्प्र्जा लाता है ... ये भी सत्य है ...

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  9. धूप और छाँव ..दोनों ही ज़रुरी हैं चलते रहने के लिए.
    छाँव मिथ्या है जैसे सुख क्षणिक होता है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. सच कहूँ तो
    धूप उतना ही सच्चा है
    जितना संघर्ष
    और छाँव उतना ही मिथ्या
    जितना सुख
    सच है न !

    और उसी संघर्ष और सुख की आकांक्षा के धूप छाँव के बीच ज़िन्दगी गुजर जाती है.


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  11. मगर धूप
    धूप का रूप नहीं
    अरूप है
    सत्य है धूप का अस्तित्व
    वह रूप नहीं बदलता
    बहुत बढ़िया पंक्तियाँ लगी यह,
    धुप से अलग कहाँ है छाँव ? उसीको अनुसरण करती है !

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी यह रचना बहुत सुन्दर है। मुझकों बहुत ही अच्छा लगा। मेरे तरफ से बहुत बहुत धन्यवाद्!

    वैसे हम इस सम्बन्ध मे कुछ लिख रहा हूँ -

    "सच तो ये हैं कि संधर्ष धुप कि वो किरण हैं जो मुश्किलों को भेदती, असंख्य किरणों से टकराती अपनी मंझिल (धरती) कि तरफ बढती रहती, अन्तत: धरा (मंझिल) पर पहुंचती हैं। इसी प्रकार संधर्ष जीवन के बरा से बरा मुश्किलों से सामना करते हुए अपनी मंझिल की ओर बढती रहती हैं चाहे मुश्किल कितना भी बरा से बरा क्यों ना आ जाय, आगे बढती रहती हैं और अंततः अपने (जीवन के ) मंझिल पर पहुचने में कामयाब होती हैं।"

    "धुप और छाव" तो जीवन की दो पहलू हैं जो "सुख एवं दुःख" के नाम से जाना जाता हैं।
    ये तो सच हैं की प्राणी सुख को जीवन का मूल आधार मान लेतें हैं, पर करवा सच ये भी हैं की दुःख के बिना सुख का कैसे अनुभव कर सकतें हैं।

    आपका दोस्त-
    मिथिलेश

    उत्तर देंहटाएं
  13. सच कहूँ तो
    धूप उतनी ही सच्ची है
    जितना संघर्ष
    और छाँव उतनी ही मिथ्या
    जितना सुख

    .....बहुत सटीक पंक्तियाँ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. विषय सोचने का है ...
    बहुत ही अच्छी रचना..:-)

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  15. क्या सुन्दर भाव है साथ ही अर्थ भी..

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  16. एक पल को छाँव भी ढूँढता है दिल... रिश्तों के स्नेह की छाँव !
    काफी सुन्दर कविता

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  17. शिवनाथ जी बहुत ही अच्छी कविता लिखी है आपने| बिलकुल सही खा आपने "धूप उतनी ही सच्ची है जितना संघर्ष और छाँव उतनी ही मिथ्या जितना सुख " आप ऐसी ही सुन्दर रचनाएं अब शब्दनगरी पर भी लिख सकते हैं|
    भारत के इस गांव की कहानी पढाई जाती है विदेश में
    जैसे लेख पढ़ व् लिख सकते हैं

    उत्तर देंहटाएं

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