बुधवार, 19 दिसंबर 2012

जाने कब !


(फोटो गूगल से साभार)


'वो रात' पिघलकर आ गिरा
दामन में
और जो दामन खोला 
मिला एक 'पत्थर'
 गाड़  दिया उस पत्थर को
जमीन में
दफना दिया उसे
कई तह लगाकर

सुना है
एक 'पेड़' उगा है उस जगह पर
उस पत्थर के सीने को चीरकर 
बहुत आश्चर्य है लोगों को
इस बात का
पर मुझे नहीं
मैंने पत्थर (दिल) को भी
आँसू  बहाते देखा है 
वो रोया है कई बार
कई बार चिल्लाया है
तो फिर आश्चर्य क्या इसमें
जो उन आँसूओं  में भीग
कोई पेड़ निकल आया है !

सुना है धागे बाँधे जाते हैं
वहाँ  उस पेड़ पर
और कोई तो हर रोज
शाम के शाम
गीत सुना जाता है वहाँ

उस पेड़ की टहनियाँ 
फैलती ही जा रही हैं
दिन पर दिन
पर इन  सबसे परे 
'वो पत्थर' आज भी
सोया पड़ा है वहीं
गहरी नींद मे
पता नहीं कब ये नींद टूटेगी
और कब वो जागेगा 
जाने कब !

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह - निराली सोच - अति सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  3. उस पेड़ की टहनियाँ
    फैलती ही जा रही हैं
    दिन पर दिन
    पर इन सबसे परे
    'वो पत्थर' आज भी
    सोया पड़ा है वहीं
    गहरी नींद मे
    पता नहीं कब ये नींद टूटेगी
    और कब वो जागेगा
    जाने कब !

    सुंदर प्रस्तुति।

    मेरे ब्लॉग पर स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह, वाकई एक बेहतरीन रचना ..बधाई हो

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर आपकी लेखनी से श्रेष्ठ सुंदर सार्थक रचनाओं का सृजन होता रहे

    उत्तर देंहटाएं
  6. उम्दा उत्कृष्ट प्रस्तुति
    यह वर्ष सभी के लिए मंगलमय हो इसी कामना के साथ..आपको सहपरिवार नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ...!!!

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  7. वाह...बेहतरीन अभिव्यक्ति...
    नववर्ष मंगलमय हो..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  8. अच्छी रचना .सुन्दर भाव आभार

    उत्तर देंहटाएं

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