गुरुवार, 28 जून 2012

क्या मैं 'जिंदा' हूँ

 

क्या मैं 'जिंदा' हूँ
'नहीं' तो थोड़ा एहसास
थोड़ी राख 'अतीत' की
भर दे कोई
मेरी मुठ्ठी में
गीत कोई गा दे 'वही'
 फिर से मेरे कानों में
और हो सके तो
पिला दे कोई मुझे
अमर संस्कारों की अमृत
करा दे स्पर्श
माँ की चरणों का
और लगा दे कोई
मिटटी मेरे बचपन की
कि मैं जिंदा हो जाऊँ फिर से
और चाँद उगने लगे
मेरे घर की देहरी पर
एक बार फिर से
हाँ, वैसे ही फिर से

19 टिप्‍पणियां:

  1. फिर से ज़िंदा होने की चाहत ही ज़िंदा होने का सबूत है
    बहुत खूब

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  2. आपके बोले के अंश तो दिल की दरवाजों को भी दस्तक दे डालती हैं और दिल के दरवाजों के खुलतें ही दिल के अंदर से आवाज आती हैं एक बार फिर आपके घर की देहरी पर चाँद उगने लगे, हाँ वसें ही फिर से ........................


    बहुत अच्छा हैं लगा शिवनाथ जी !

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  3. दिल को छु जाने वाला कविता है ...... बहुत अच्छा लगा......

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  4. अपने एहसासों को जिन्दा कर ...फिर से निकलों अपनी यादोँ की बरात लेकर ...जिन्दा हो जाओगे .....
    शुभकामनाएँ !
    लगता है मेरी पिछली टिपणी भी स्पैम में
    चली गयी है ..कृपया वहाँ से निकालें!

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  5. उत्साहवर्धन एवं टिप्पणी के लिए आपसबों को धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  6. गहन भावों की अभिव्यक्ति|
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. सशक्‍त लेखन के साथ उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ... आभार ।

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  8. जीने की चाह और अतीत में जीने की चाह तो सभी रखते हैं ... शायद उसी में जिन्दा होता है जीवन ... गहरी सोच से उत्पन रहना ...

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  9. बहुत, बहुत खूबसूरत कविता।
    सभी की कामना को आपने कोमल शब्द दिए हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  10. शिवनाथ कुमार जी आपकी इस बेहतरीन रचना को हमारा हरयाणा ब्लॉग पर साँझा किया है

    -- संजय भास्कर
    http://bloggersofharyana.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  11. शिवनाथ कुमार जी आपकी इस बेहतरीन रचना को कवितमंच ब्लॉग पर साँझा किया है

    -- संजय भास्कर
    http://kavita-manch.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

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