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| (फोटो गूगल से साभार) |
मैं एक खुली किताब
जिसने भी मुझे पढ़ा
मुझे भिगोता गया
अपने आँसूओं से
जिस वजह से
मेरे शब्द
धुंधले हो गए हैं
मुझे पढ़ने में अब
लोगों को बड़ी मुश्किलें होती है
शब्द , स्पष्ट नहीं दिखते
और कहीं कहीं तो
पूरा का पूरा
पृष्ठ ही धुंधला है
मुझे पढ़ने वाले
अब समझ नहीं पाते मुझे
अनुमान से शब्द अधूरे, पूरे करते हैं
पर वो शब्द 'अधूरा' ही रह जाता है
और शायद 'सत्य' भी
कभी कभी
खुली किताब होना भी
अस्तित्व के लिए
खतरा बन जाता है
जाने अनजाने में ही
बहुत कुछ मिट जाता है
बड़ा ही पीड़ादायक होता है फिर
खुद को संभालना
मैं और क्या कहूँ तुमसे
तुम मुझे ही देख लो !

