बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

खुली किताब



(फोटो गूगल से साभार)


मैं एक खुली किताब
जिसने भी मुझे पढ़ा
मुझे भिगोता गया 
अपने आँसूओं से 

जिस वजह से 
मेरे शब्द 
धुंधले हो गए हैं 
मुझे पढ़ने में अब
लोगों को बड़ी मुश्किलें होती है 
शब्द , स्पष्ट नहीं दिखते
और कहीं कहीं तो 
पूरा का पूरा 
पृष्ठ ही धुंधला है

मुझे  पढ़ने वाले
अब समझ नहीं पाते मुझे
अनुमान से शब्द अधूरे, पूरे करते हैं 
पर वो शब्द 'अधूरा' ही रह जाता है
और शायद 'सत्य' भी 

कभी कभी 
खुली किताब होना भी
अस्तित्व के लिए 
खतरा बन जाता है
जाने अनजाने में ही
बहुत कुछ मिट जाता है 
बड़ा ही पीड़ादायक होता है फिर
खुद को संभालना 
मैं और क्या कहूँ तुमसे
तुम मुझे ही देख लो !




मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ

(फोटो गूगल से साभार)

चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
तबियत में उतार चढ़ाव लाजिमी है 
जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ 

हसरतें कई बह जाती हैं
रेतीली लहरों के साथ साथ 
उम्मीदें कई उड़ जाती हैं
बहती हवाओं के साथ 
पर मजबूर हूँ दिल से ए जिंदगी
मुस्कुराने की आदत है, मुस्कुराता चलूँ
हसरतों का कारवां फिर बनाता चलूँ 

कोरे कागज़ पर लिख कर 
क्यूँ फेंक दे फिर उसे मोड़ माड़ कर 
तल्खियां रिश्तों में आम है
क्या मिला है बगिया उजाड़ कर  
उड़ाने और लपेटने का पतंग
सिलसिला ये लाजवाब है
रिश्तों को संभालना जो सीख ले
वो दुनिया में बेमिसाल है
अपनापन सा कुछ मिठास मिलाता चलूँ
रिश्ता इंसानियत का और बनाता चलूँ 

बिखरना और टूटना मानता हूँ
पर टूट कर जुड़ना भी जानता हूँ
अमावस का आना तय है हर महीने
ख्याल में पूणर्मासी के रातें गुजारता हूँ 
सीखने को बहुत कुछ है जिंदगी में
पर ढाई आखर की महता पहचानता हूँ 
हैं अंधेरों से बातें करती कई राहें
उन राहों पर दीप जलाता चलूँ 
जिंदगी तुम बहुत खूबसूरत हो
चलो तुम्हें तुम्हारा दीदार कराता चलूँ 



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