दिग दिशाओं से कोई
गर्जन करता आता है
नैन तकते वसुधा को
दूर ही से आवाज लगाता है
मंद समीर की बढ़ी गति, नभ का संदेशा लाता है
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है
विटप लतिकाएँ झूम झूम कर
आलिंगन करती आनंदित होकर
उड़ रहे तृण पात हवा में
दौड़ रहे आह्लादित होकर
झूम रही लतिकाओं का, नृत्य-गान दिख जाता है
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है
दिखती विहगों की कलाबाजियां
करती हवाओं संग अठखेलियाँ
नभ का कोना छू रहे
टूटी मानो पैरों की बेड़ियाँ
नभचरों का नव नर्तन, नव स्पंदन भर जाता है
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है
तीक्ष्ण किरणों का विस्तृत जाल
अब भंग हुआ जाता है
नभ का जादूगर अनूठा
अपना मायाजाल बिछाता है
पुंज तेज रविकर का, कैसे मद्धम पड़ता जाता है
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है
@फोटो: गूगल से साभार

