सोमवार, 17 अगस्त 2026

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते

चित्र - ए आई निर्मित

                                                                     (चित्र - ए आई निर्मित)


उमड़ रहें हैं गगन पर बादल

नाच रही कोई बाँध के पायल

धरा का है श्रृंगार अनोखा

बाट जोहती लगा के काजल

उल्लासित हैं चंचल नयन

झूम रहे फूलों के दल-बल  

वो क्या जाने मन की बातें, हवा में घुलतीं अनगिन जज्बातें

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते


तृण पात सारे डोल रहें हैं

मन की परतें खोल रहें हैं

धीरे धीरे मद्धम मद्धम

कानों में कुछ बोल रहें हैं

बूंदों से आह्लादित मन

जंजीरें कितनी तोड़ रहे हैं

खुल रहे मन के बंधन आज, झींगुर प्रिय के गीत सुनाते

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते


काली बदरिया जिसे झूम के गाती

बूंदों लिखी वो पिया की पाती

कल-कल करती बारिश की बूंदे

कभी मचलतीं, कभी शरमातीं

आँगन सारा नाच रहा

नाच रहे हैं दिया बाती

कहीं खुले हैं कुछ झरोखे, पिया की बातें याद दिलाते

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते 


(रचनाकार - शिवनाथ कुमार)

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद सुंदर मनमोहक रचना,ऐसी कविताएं आजकल पढ़ने कहां मिलती हैं।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १८ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं

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