सोमवार, 30 जून 2014

छोड़ आया हूँ कुछ नगमें ..



(फोटो गूगल से साभार)



छोड़ आया हूँ कुछ नगमे 
साहिलों पर तेरे नाम से 
शाम छुपा कर रख दिया है 
वही रेत की ढेर में 
कुछ पत्थर उगा आया हूँ 
वहाँ आस पास 
बस जो सावन आ जाए  
झूम लेंगे तब सभी 
अभी तो शांत सोए हैं 
सब अलसाई नींद में 
 
कश्ती पड़ी वही 
थकी सी हार कर  
सूरज से मिल लौटा था
दरिया को पार कर 
उम्मीद डूबी नहीं 
इक सूरज के डूबने से 
लो कारवां चल पड़ा फिर  
इक चाँद के उगने से 



9 टिप्‍पणियां:

  1. जब नगमें जागेंगे यादों में ढल जायेंगे ...
    गहरी रचना ...

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  2. कश्ती पड़ी वही
    थकी सी हार कर
    सूरज से मिल लौटा था
    दरिया को पार कर
    उम्मीद डूबी नहीं
    इक सूरज के डूबने से
    लो कारवां चल पड़ा फिर
    इक चाँद के उगने से
    bahut sundar abhivyakti shivnath ji

    उत्तर देंहटाएं
  3. दरिया को पार कर
    उम्मीद डूबी नहीं
    इक सूरज के डूबने से
    लो कारवां चल पड़ा फिर
    इक चाँद के उगने से
    उम्‍मीदों के साये हमेशा साथ रहते हैं .... अनुपम भाव

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@दर्द दिलों के
    नयी पोस्ट@बड़ी दूर से आये हैं

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर लफ्ज़ मन की धरा पर गहराई से लकीर उकेरता हुआ ! बहुत ही बेहतरीन रचना ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार, कल 28 जनवरी 2016 को में शामिल किया गया है।
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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