सोमवार, 5 मई 2014

प्रश्न श्रृंखला !


(फोटो गूगल से साभार)



आखिर क्या मिलेगा ऐसा करने से ?
आखिर क्यों, किसलिए ?
ऐसे कई प्रश्न 
हर पल उठते हैं ज़ेहन  में 
प्रश्नों की एक श्रृंखला 
अनजाने मन में ही सही 
बन रही होती है कहीं 
किसी कोने में 
लेकिन हम बेपरवाह से हुए 
नकारते रहते हैं  
उसके वजूद को 
पर जब मन  बँध जाता है 
उसके पाश में पूरी तरह 
तब खुद को छुड़ाने की कोशिश में 
हम ढूंढना शुरू करते हैं उत्तर 
और जब ढूंढते हैं उत्तर 
हर उत्तर एक प्रश्न लिए खड़ा होता है 
और प्रश्नों की श्रृंखला 
घटने की बजाय 
बढ़ती चली जाती है 
रह जाते हैं इस तरह 
कई प्रश्न अनुत्तरित 
और अंत में 
दफ़न हो जाते हैं 
कई प्रश्न, यूँ ही  
कब्र के अंदर !




8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (05-05-2014) को "खो गई मिट्टी की महक" (चर्चा मंच-1604) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. कई बार यह भी होता है कि प्रश्न का उत्तर ही नहीं होता है. पर पूरे प्रक्रिया से ज्ञानवर्धन हो जाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आकाश में बादलों का आना जाना
    वैसे ही है जैसे मन में प्रश्नों का आना
    New post ऐ जिंदगी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रश्नों के उत्तर नहीं चाहते हम ... अपने आप से तर्क करना चाहते हैं ... किसी की सत्ता नहीं मानते ...
    फिर उलझते जाते हैं ... अर्थपूर्ण रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. आखिर क्या मिलेगा ऐसा करने से ?
    आखिर क्यों, किसलिए ?
    ऐसे कई प्रश्न
    हर पल उठते हैं ज़ेहन में
    प्रश्नों की एक श्रृंखला


    सृजनशीलता की व्याकुलता से कसमसाते प्रश्नों की जीवंत अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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