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| (फोटो गूगल से साभार) |
सावन भादो सब भीगा
मन कतरा कतरा भीगा
रात का तनहा आकाश
कभी आधा
तो कभी पूरा चाँद भीगा
मोहन मुरली बन बजा
फूलों की इक सेज सजा
राधिके के आगमन को
यमुना तट पर, बन गीत बजा
शशि ज्यों आ जाता नित
संध्या के आकाश पर
निज मन उदित होता हर रोज
पूर्ण प्रेम की आश पर
अथाह समंदर गहरा जा डूबा
सूरज सा फिर उगने को
प्रेम का कभी अंत नहीं
नहीं रुका कभी रुकने को
मन कतरा कतरा भीगा
रात का तनहा आकाश
कभी आधा
तो कभी पूरा चाँद भीगा
मोहन मुरली बन बजा
फूलों की इक सेज सजा
राधिके के आगमन को
यमुना तट पर, बन गीत बजा
शशि ज्यों आ जाता नित
संध्या के आकाश पर
निज मन उदित होता हर रोज
पूर्ण प्रेम की आश पर
अथाह समंदर गहरा जा डूबा
सूरज सा फिर उगने को
प्रेम का कभी अंत नहीं
नहीं रुका कभी रुकने को

