सोमवार, 5 मई 2014

प्रश्न श्रृंखला !


(फोटो गूगल से साभार)



आखिर क्या मिलेगा ऐसा करने से ?
आखिर क्यों, किसलिए ?
ऐसे कई प्रश्न 
हर पल उठते हैं ज़ेहन  में 
प्रश्नों की एक श्रृंखला 
अनजाने मन में ही सही 
बन रही होती है कहीं 
किसी कोने में 
लेकिन हम बेपरवाह से हुए 
नकारते रहते हैं  
उसके वजूद को 
पर जब मन  बँध जाता है 
उसके पाश में पूरी तरह 
तब खुद को छुड़ाने की कोशिश में 
हम ढूंढना शुरू करते हैं उत्तर 
और जब ढूंढते हैं उत्तर 
हर उत्तर एक प्रश्न लिए खड़ा होता है 
और प्रश्नों की श्रृंखला 
घटने की बजाय 
बढ़ती चली जाती है 
रह जाते हैं इस तरह 
कई प्रश्न अनुत्तरित 
और अंत में 
दफ़न हो जाते हैं 
कई प्रश्न, यूँ ही  
कब्र के अंदर !




बुधवार, 30 अप्रैल 2014

भागता चला जाता हूँ !

 (फोटो गूगल से साभार)



कि आजकल सपने 
कितने डरावने हो गए हैं 
अजीब अजीब आकृतियाँ 
अजीब अजीब परछाईयाँ 
पीछा करती हुई अक्सर 
और 'मैं' भागता हुआ 
पीछा छुड़ाता हुआ 
कादो कीचड़ में पैर सनते हुए 
और फिर भी 
निकलने की जद्दोजहद 
अजीब सा खौफ 
चेहरे पर 
पसीनापस माथा 
साँप बिच्छू 
और कई तरह तरह की चीजें 
सामने दिख जाते हैं 
कभी डर से मूक खड़ा 
तो कभी लड़ने की कोशिश 
सांप की बजाय मैं रेंगता हुआ 
और कभी कभी प्राणहीन सा शरीर
बिलकुल शिथिल 
बस जैसे सौंप दिया हो 
खुद को 
परिस्थिति के हाथों में 
पर ना जाने 
फिर क्या होता है 
पता नहीं 
थोड़ी सी आशा 
जाग उठती है  मन में 
कहीं से तो प्राण आते हैं 
शिथिल हुए पैरों में 
और मैं फिर भागने लगता हूँ 
और भागता चला जाता हूँ !



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