शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार





पुलकित आनंदित अंतर्मन
देख रहा कोई दर्पण
विकार रहित हुआ जाता है 
खुल रहा मन का बंधन 
व्याकुल मन की व्यथाएँ चली व्योम के पार 
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार  


अभिलाषाएँ कुछ दबी हुई 
जाग गयी, थीं सोयी हुई 
उल्लासित आँखें जागती हैं  
तरुण हृदय संग बंधी हुई 
खोल गया हो जैसे कोई बंद हृदय के द्वार 
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार


विस्मृत यादें फिर झूमी 
नाच रही संग रंगभूमि
उन्मुक्त भाव संग झूम रहे  
ज्यों घुंघरू बाँध कोई बाला झूमी     
सूनी साजों पर कोई छेड़ गया फिर मन का तार 
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार





@फोटो:  गूगल से साभार

रविवार, 7 जुलाई 2013

धूप और छाँव







जो चुनना हो 
धूप और छाँव में 
चुनूँगा धूप 
क्यूँकी छाँव ....
छाँव तो मिथ्या है 
बहरुपी है


मगर धूप 
धूप का रूप नहीं 
अरूप है 
सत्य है धूप का अस्तित्व 
वह रूप नहीं बदलती


धूप जीवन 
भरती है 
पेड़ों में 
पौधों में 
फसलों में
धरा का कण कण 
होता पोषित 
धूप से 


जिसने धूप स्वीकारा 
फला फूला
और जो बैठा रहा 
छाँव तले  
उसे क्या मिला ! 
  

सच कहूँ तो 
धूप उतनी ही सच्ची है 
जितना संघर्ष 
और छाँव उतनी ही मिथ्या 
जितना सुख 




@फोटो:  गूगल से साभार 
 

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