पुलकित आनंदित अंतर्मन
देख रहा कोई दर्पण
विकार रहित हुआ जाता है
खुल रहा मन का बंधन
व्याकुल मन की व्यथाएँ चली व्योम के पार
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार
अभिलाषाएँ कुछ दबी हुई
जाग गयी, थीं सोयी हुई
उल्लासित आँखें जागती हैं
तरुण हृदय संग बंधी हुई
खोल गया हो जैसे कोई बंद हृदय के द्वार
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार
विस्मृत यादें फिर झूमी
नाच रही संग रंगभूमि
उन्मुक्त भाव संग झूम रहे
ज्यों घुंघरू बाँध कोई बाला झूमी
सूनी साजों पर कोई छेड़ गया फिर मन का तार
हर्षित मन मना रहा बूँदों का त्योहार
@फोटो: गूगल से साभार

