जो चुनना हो
धूप और छाँव में
चुनूँगा धूप
क्यूँकी छाँव ....
छाँव तो मिथ्या है
बहरुपी है
मगर धूप
धूप का रूप नहीं
अरूप है
सत्य है धूप का अस्तित्व
वह रूप नहीं बदलती
धूप जीवन
भरती है
पेड़ों में
पौधों में
फसलों में
धरा का कण कण
होता पोषित
धूप से
जिसने धूप स्वीकारा
फला फूला
और जो बैठा रहा
छाँव तले
उसे क्या मिला !
सच कहूँ तो
धूप उतनी ही सच्ची है
जितना संघर्ष
और छाँव उतनी ही मिथ्या
जितना सुख
@फोटो: गूगल से साभार

