रविवार, 7 जुलाई 2013

धूप और छाँव







जो चुनना हो 
धूप और छाँव में 
चुनूँगा धूप 
क्यूँकी छाँव ....
छाँव तो मिथ्या है 
बहरुपी है


मगर धूप 
धूप का रूप नहीं 
अरूप है 
सत्य है धूप का अस्तित्व 
वह रूप नहीं बदलती


धूप जीवन 
भरती है 
पेड़ों में 
पौधों में 
फसलों में
धरा का कण कण 
होता पोषित 
धूप से 


जिसने धूप स्वीकारा 
फला फूला
और जो बैठा रहा 
छाँव तले  
उसे क्या मिला ! 
  

सच कहूँ तो 
धूप उतनी ही सच्ची है 
जितना संघर्ष 
और छाँव उतनी ही मिथ्या 
जितना सुख 




@फोटो:  गूगल से साभार 
 

शुक्रवार, 21 जून 2013

नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है




दिग दिशाओं से कोई 
गर्जन करता आता है 
नैन तकते वसुधा को 
दूर ही से आवाज लगाता है   
मंद समीर की बढ़ी गति, नभ का संदेशा लाता है 
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है  


विटप लतिकाएँ झूम झूम कर 
आलिंगन करती आनंदित होकर 
उड़ रहे तृण पात हवा में 
दौड़ रहे आह्लादित होकर 
झूम रही लतिकाओं का, नृत्य-गान दिख जाता है 
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है  


दिखती विहगों की कलाबाजियां 
करती हवाओं संग अठखेलियाँ
नभ का कोना छू रहे  
टूटी मानो पैरों की बेड़ियाँ 
नभचरों का नव नर्तन,  नव स्पंदन भर जाता है 
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है 
 
 
तीक्ष्ण किरणों का विस्तृत जाल  
अब भंग हुआ जाता है 
नभ का जादूगर अनूठा 
अपना मायाजाल बिछाता है 
पुंज तेज रविकर का, कैसे मद्धम पड़ता जाता है 
नभ पर बादल देखो कैसे उमड़ घुमड़ कर छाता है 





@फोटो: गूगल से साभार

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