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रविवार, 1 अप्रैल 2012

आखिर बन ही गए ....

       (फोटो गूगल से साभार)



आज १ अप्रैल है और जेहन में कुछ यादें ऐसे ही ताजा हुए जा रहीं हैं |  सोचता हूँ कुछ लिख ही डालूँ , और जो बातें मुझे गुदगुदा रही हैं थोडा आपलोगों से भी शेयर कर लूँ |  "अप्रैल फूल".... इस दिन बहुत मजा किया करते थे हमसब | "हमसब" बोले तो मैं और मेरे मित्रगण |  कुछ मजेदार बातें हैं , शायद आपको भी अच्छा लगे | ये अलग बात है कि मैं अपनी मूर्खता का विवरण स्वयं अपने ही मुख से कर रहा हूँ | हाँ, तो मुझे बहुत ही शौक हुआ करता था Fool's  डे पर लोगों को मूर्ख बनाने में, या यूँ कहे कि उन्हें छकाने में |  वैसे तो छोटे मोटे तरीके से तो हम खूब मजा लिया करते थे लेकिन उनमें से एक ख़ास है जो मै आपलोगों को जरुर बताना चाहूँगा | मैंने अपने एक मित्र को कैसे छकाया वो बताता हूँ | मेरे मित्र के पास उस समय मोबाइल नहीं था (ये अलग बात है कि आज अधिकांश लोगों के पास आपको मोबाइल मिल ही जाएगी ) और अक्सर उसके घर से फ़ोन आया करता था, पास के ही एक बूथ पर | फिर बूथ वाला उसे बुलाकर लाया करता था और तब बात हुआ करती थी |  हमने १ अप्रैल को उस बूथ में बैठने वाले बच्चे को कुछ टॉफी दिया और फिर उसे बोला कि जाकर उसे बोले कि उसके घर से फोन आया है | उसने वैसा ही किया | बेचारा वो नींद में सोया हुआ था , दोपहर का समय था | नींद तोड़कर उठा और बूथ पर आ कर बैठ गया और फोन का इंतजार करने लगा | १०-१५ मिनट तक बैठने के पश्चात जब कोई फोन ( सो तो नहीं ही आना था ) नहीं आया तब हमलोग वहाँ पहुंचे ( मैं और मेरा एक अन्य मित्र ) |  उसकी नजर हमपर पड़ी, फिर हमलोग थोडा मुस्कुराए और तब उसे समझते देर नहीं लगी कि वह १ अप्रैल का शिकार बना है |  फिर १ अप्रैल को कोई Fool  बने तो वो  काफी खतरनाक हो जाता है | उसमें भी कहीं न कहीं बदले कि भावना तो जागृत हो ही जाती है | और यह तो सेकेण्ड टाईम था जब उसे हमलोगों ने उसे इस तरह से छकाया था | इस बार तो चैलेंज लगा था कि कोई Fool  बनाकर देख ले |  लास्ट टाईम तो इससे भी बुरा हुआ था | जनाब को अस्पताल के चक्कर कटवा दिए थे दिन भर ( ये भी एक बड़ा ही जबरदस्त वाकया है, १ अप्रैल का), सो इस बार तो वो सतर्क था | फिर भी बन ही गया | अब क्या करें, यही सोचते हुए थोडा मुस्कुराकर हमसब चले और जाकर उसके रूम पर बैठ गए | गप्पें मारने कि आदत थी , सो गप्पे चलने लगीं ... | इधर - उधर कि बातें होने लगी | लेकिन हम भी सतर्क थे कहीं हम भी मूर्ख न बन जाएँ | हमें तो पता था कि हम अलर्ट हैं इसलिए कोई कितना भी चाह ले , अब तो हम मूर्ख नहीं ही बन सकते |  कुछ देर बातें करने के बाद मेरा मित्र नीचे दूकान से कुछ नाश्ता लाने को गया | दूकान बस ५ मिनट की दूरी पर था | वह १०-१५ मिनट में आया |  साथ में कुछ बिस्किट्स और टोफियाँ थी और कुछ नमकीन | हमलोग खाए जा रहे थे और बातें किये जा रहे थे | एक टॉफी हमलोगों को काफी अच्छी लगती थी , वह सफ़ेद रंग का होता था | वह जब भी कुछ लाने जाता था तो वो टॉफी जरुर लाता था  | इसबार भी वह टॉफी वह  लाया था  | सो हमें इसका एहसास भी नहीं था कि अब हमलोग बहुत अच्छी तरीके से मूर्ख बनने जा रहे थे | क्या हुआ होगा, जरा सोचिये ...... शायद आप वो नहीं सोच सकते जो उसने सोचा था | हमलोगों ने जब वो टॉफी मुँह में रखी कि बस हो गया..... उसके आगे हम बिलकुल शांत हो कर एक-दूसरे कि ओर देखने लगे | मेरे दूसरे मित्र ने वह टॉफी पहले ही खा ली थी और अगर वो चाहता तो मुझे बता सकता था कि मत खा पछतायेगा, पर नहीं उसने सोचा कि जब मै मूर्ख बन ही चुका हूँ तो फिर और कोई क्यों बचे | यह तो मानवीय सोच है |  खैर रहने दीजिये, मुख्य बात पर आते हैं कि आखिर उस टॉफी में ऐसी ख़ास बात क्या थी कि हम मूर्ख बन गए | तो बात यह थी कि मेरे मित्र महोदय ने दूकान जाने के बहाने पहले तो सफ़ेद मोमबती खरीदी और एक दूसरी जगह जाकर उसे पीसकर उसको उस टॉफी के आकार में इस तरह से ढाला कि कोई भी नहीं पहचान सकता था कि यह सफ़ेद रंग वाली वही टॉफी नहीं है जो हम प्रायः खाया करते थे |  और यह सब इतनी तेजी से किया कि हमें जरा सा भी शक नहीं हुआ कि उसने ऐसा कुछ किया है |  तो फिर क्या था , मुँह में लेने के बाद , थोड़ी देर के लिए हमारा मुँह तो लटक गया लेकिन मेरे मित्र का चेहरा खिल गया | आखिर इतने जबरदस्त तरीके से बदला लिया था पूरे सूद सहित | बाद में हमने उसकी चतुराई और उसके प्रयास के लिए बुझे मन से बोला "मान गए भाई, हमने सोचा भी नहीं था इस बारे में, बाहर किसी को मत बताना, अपनी तो इज्जत ही चली जाएगी "। फिर थोड़ी देर बाद, हमसब रूम से निकल पड़े , अगले शिकार की तालाश में ....... ;)

मंगलवार, 14 जून 2011

गोरैया : एक संस्मरण

(फोटो गूगल से साभार)
बात उन दिनों की है जब मैं करीब १३ साल का होऊँगा । हमारे यहाँ घरों में अक्सर गोरैया (एक पक्षी) अपना घोंसला बना लेती है । मेरे घर में भी गोरैया का एक ऐसा ही घोंसला था । उसमे गोरैया का एक जोड़ा रहा करता था । उन्हें घोंसले में आते जाते देखना अच्छा लगता था । घोंसले में गोरैया का एक नवजात बच्चा भी था  । जब कभी गोरैया अपने बच्चे  के लिए बाहर से कड़ी मेहनत कर अनाज के कुछ दाने लाते थे  तब उनकी चहचहाहट से माहौल खुशनुमा हो जाया करता था । मैं और मेरा छोटा भाई दोनों अक्सर देखा करते थे इस दृश्य को । गोरैया के जोड़े अपने चोंच से दाना उठा उठाकर अपने बच्चे के मुँह में रखा करते थे । बहुत ही सुन्दर और आत्मीय दृश्य होता था वह । कुल मिलाकर एक छोटा मगर हँसता - खेलता परिवार था गोरैया का ।

पर कहते हैं न कि अनहोनी आपके आसपास हमेशा मंडराती रहती है । ऐसा ही कुछ हुआ उस गोरैया परिवार के साथ। बात यह थी कि जिस कमरे में उन्होंने अपना घोंसला बनाया था उसमें एक पंखा टंगा हुआ था । हालांकि हमलोग अक्सर इस बात का ध्यान रखा करते थे कि जब कभी वो कमरे में हों , पंखा बंद रहे । पर शायद होनी को कौन टाल सकता है । उस गोरैया माता-पिता में से एक उस पंखे कि चपेट में आ गया । और वहीं उसने अपने प्राण त्याग दिए, अपने पीछे एक छोटा सा संसार छोड़कर । हमने सुबह उसके निर्जीव शरीर को देखा और काफी दुखित हुए ।
उस घटना के बाद से हमलोग (मैं और मेरा छोटा भाई) तनहा अकेले बचे उस गोरैया और उसके बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान रखने लगे । हम भी उनके दुःख में शामिल थे पर ना तो हम उन्हें सांत्वना दे सकते थे और ना ही अपनी संवेदना उनके सामने प्रकट कर सकते थे । हमलोग अक्सर नीचे बिछावन पर बैठकर उनके घोंसले की ओर देखा करते थे , जहाँ से वो गोरैया भी हमें देखा करती थी , आँखों में एक सवाल लिए जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं था ।

कुछ दिन इसी तरह बीतता गया । पर एक दिन ना जाने क्या हुआ , गोरैया कमरे में नहीं आई । गोरैया के उस नवजात बच्चे की तरह , हमलोग भी उसके आने का इन्तजार कर रहे थे । रात बीत गया .... सुबह हो गई ... पर वो नहीं आई । बच्चा भूख से छटपटा रहा  था जो कि उसके करुण आवाज़ में सहज ही प्रकट होता था । उसकी इस छटपटाहट के साथ हमारे मन में भी आशंकाओं की सुनामी उठने लगी थी । हमलोग इस सोच में पड़े थे कि आखिर क्या हुआ जो वह नहीं आई । हमसे उसकी भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी ।

हमलोगों ने शाम तक गोरैया का इन्तजार किया पर वह नहीं आई । अंततः हमदोनों ने गोरैया के बच्चे को खुद से ही दाना खिलाने की सोची । हमने घर में बने चावल के कुछ दाने लिए और उनके घोंसले में रख दिया , एक छोटी सी कटोरी में रखकर । कुछ देर बाद जब हमने मुआयना किया तो देखा कि सारे चावल के दाने ज्यों के त्यों पड़े थे। हम बहुत उदास हुए । हमें ऐसा लगा के शायद वो हमारे हाथ का दिया दाना नहीं खाना चाहते थे । फिर हमें ध्यान आया कि अभी तो वह नवजात है और खुद  दाना नहीं चुग सकता है । तभी तो उसके माता-पिता अपनी चोंच से दाना उसके मुँह में डालते थे । तब हमने अपने हाथों से एक एक दाना लेकर उनके मुँह में डालना शुरू किया । और वह उसे सप्रेम स्वीकार करता गया । आखिर उसे भूख भी तो लगी थी .... । उसके कोमल चोंच जब हमारे हाथों कि उँगलियों को स्पर्श करते थे तो एक सुखद आनंद की अनुभूति होती थी । कुछ ही दिनों में हमारा उसका संबंध बहुत आत्मीय हो गया था । हमें ऐसा लगता था कि हमने भाषायी सीमाओं को तोड़ दिया है और मनुष्य एवं पक्षी के बीच की खाई को भी पाट दिया है । उसकी आँखें हमारे लिए भाषा और अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई थीं । उसकी चहचहाहट काफी कुछ बयां कर देती थी | तब समझ में आया की संबंधों में भाषायी विविधता कोई बड़ी समस्या नहीं है , बस आत्मीयता होनी चाहिए , प्रेम होना चाहिए । पर आज मनुष्यों के बीच शायद इसका अभाव है ।


(फोटो गूगल से साभार)
इसी तरह दिन बीतता गया । हम उन्हें रोज दाना खिलाया करते थे , अपने हाथों से ।  हमें एक डर भी था कि कहीं वह गलती से ऊपर बने उस घोंसले से नीचे ना गिर जाए । हालाँकि ऐसी संभावना कम ही थी लेकिन फिर भी हमने खुद से उसके  लिए एक अलग घोंसला बनाया, घास-फूस और पत्तों से पूरी तरह से सुरक्षित । हमने घोंसले को एक चारों तरफ से बंद तथा ऊपर से खुले काठ के एक बक्से में रखकर उसमें उन बच्चों को रख दिया । अब वह सुरक्षित था  और हम निश्चिन्त .... । हम निश्चिन्त थे कि अब वो गिर नहीं सकता था ।  अब तो वो जब भी हमें देखता था बस चहकना शुरू कर देता था । फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे देखकर हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । हुआ यह कि वह घोंसले से बाहर निकलकर कमरे में इधर - उधर फुदक रहा था । वह उड़ने की कोशिश कर रहा था । हमने भी उसके उड़ान भरने के प्रयास में अपने स्तर से सहयोग किया । हालांकि अभी वह छोटी - छोटी उड़ाने ही भरता था पर वह हमारे लिए सुकुनकारक एवं आनंदकारी था , आखिर उसने उड़ने की कोशिश जो शुरू कर दी थी । हम काफी खुश थे .... ।

फिर एक दिन आया जब उसने लम्बी उड़ान भरी और उड़कर हमारे घर के बाहर एक आम की डाली पर जा बैठा । बहुत अच्छा लग रहा था .... । खुशी हुई पर एक दुःख भी था मन में कि आज वह हमें छोड़कर अपनी दुनिया में जा रहा था । तब उसकी आँखों में दूर से ही देखा था  हमने , हमारे लिए आत्मीय प्रेम को .......... और एक वादा ........ फिर से मिलने का ....... ।

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